!!..लोग कहेते है की मुस्लिम को आतंकवादी नजरो से नहीं देखा जाता ….ये पोस्ट उनलोगों के मूह पे तमाचा है वो भी थूक लगा के ….!!


!!..लोग कहेते है की मुस्लिम को आतंकवादी नजरो से नहीं देखा जाता ….ये पोस्ट उनलोगों के मूह पे तमाचा है वो भी थूक लगा के ….!!

उत्तर प्रदेश के शहर देवबंद के सुप्रसिद्ध मदरसे के एक मौलाना के बारे में पिछले दिनों यह ख़बर लगभग हर समाचार पत्र में थी कि कथित तौर पर विमान को उड़ाने की बात कहने के आरोप में मौलाना नूरुल हुदा को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था, बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया.
बीबीसी की संवाददाता ख़दीजा आरिफ़ ने देवबंद में मौलाना नूरूल हुदा से बातचीत की:
सबसे पहले आप ये बताइए कि जब आप विमान में सवार हो गए और जब विमान उड़ने वाला था तो क्या हुआ?
मैं एमिरेट्स एयरलाइन की अपनी सीट पर बैठ गया. मेरी पास वाली सीट पर एक लड़की बैठी थी.
जहाज़ में और लोग भी फ़ोन पर बात कर रहे थे और वह लड़की भी फ़ोन पर बातें कर रही थी.
उस लड़की ने भी अपने रिश्तेदारों से बातें की. वह हिंदी और अंग्रेज़ी में बातें कर रही थी तो उससे मुझे अंदाज़ा हुआ कि वह हिंदुस्तानी है.
मैंने भी अपनी पत्नी और अपने बेटे से फ़ोन पर बात की.
मेरा बेटा मुझे एयरपोर्ट छोड़ने आया था. उसने मुझे फ़ोन किया और पूछा कि अब्बू आप जहाज़ में बैठ गए तो मैंने उससे कहा कि जहाज़ में बैठ गया हूं और बस 15 मिनट में जहाज़ उड़ने वाला है. उसके बाद मैंने कोई और बात नहीं की.

मैंने किसी राजनीतिक पार्टी से संपर्क नहीं किया. मुझे पूरी तरह से मालूमात भी नहीं मिली. मेरा पूरा सामान ज़ब्त था. तो मैं किसी से संपर्क कर भी नहीं सकता था.

मौलाना नूरुल हुदा
लेकिन जहाज़ समय पर नहीं उड़ा. बल्कि काफ़ी देर हो गई. इसी बीच मैंने महसूस किया कि वह लड़की भी अपनी सीट से उठ कर चली गई है.
थोड़ी देर बाद एक कर्मचारी मेरे पास आया और मेरा पासपोर्ट मांगा और उसके बाद उसने कहा अपना सामान उठा लीजिए और मेरे साथ चलिए, उस लड़की को भी जहाज़ से उतार लिया गया.
उस लड़की से मेरे सामने तो कोई पूछताछ नहीं की गई लेकिन कर्मचारी ने मुझे बताया कि उस लड़की ने उन्हें बताया है कि मैं जहाज़ को उड़ाने की बात कर रहा था.
मैंने कहा मैं तो आलिम (आध्यात्मिक) आदमी हूं. मदरसे से मेरा ताल्लुक़ है और पढ़ने-पढ़ाने का काम करता हूं.
हम तो यह सीख देते हैं कि किसी को नुक़सान न पहुंचाइए. मैंने उनसे कहा कि मेरी फ़ोन पर यह बात हुई है और आप चाहें तो कंप्यूटर से पता करलें कि फ़ोन पर क्या बात हुई है.
उन्होंने मेरे सामान की तलाशी ली और कई बार तलाशी ली. कोई चीज़ उनको नहीं मिली.
उनको चाहिए था कि वो फिर मुझे जाने देते. मुझे बाद में पता चला कि दूसरी फ़्लाइट से उस लड़की को भेज दिया गया.
लेकिन बार बार अलग अलग अधिकारी एक-एक करके या गुट बना कर आते रहे और मुझ से जहाज़ को उड़ाने वाली बात करते रहे.
मैंने उनसे कहा कि ये बताएं कि ट्रेन को कहते हैं चलने वाली है. गाड़ी के बारे में कहते हैं चल रही है क्योंकि ये सब चलती हैं.
जहाज़ के बारे में ये भी कहा जाता है कि उड़ने वाला है. अगर नहीं तो आप मुझे इसका मोतबादिल (पर्याय) बता दें कि अगर जहाज़ उड़ता नहीं तो क्या करता है?
एक साहब ने कहा कि मुझे अंग्रेज़ी में कहना चाहिए था कि जहाज़ उड़ने वाला है.
मैंने कहा मैं हिंदुस्तानी हूं और हिंदी बोलता हूं. इसके बाद वो मेरे साथ इज़्ज़त से पेश आए.
उसके बाद मुझे ये अंदाज़ा हुआ कि हर विभाग में अच्छे और बुरे लोग होते हैं. लेकिन जो मानसिक तकलीफ़ मुझे हुई उससे मुझे अभी तक परेशानी है.
अधिकारियों ने मेरे साथ कोई बदतमीज़ी नहीं की.
देवबंद मदरसे के बच्चे
देवबंद का मदरसा दारुल उलूम दुनिया भर में इस्लामी शिक्षा के लिए मशहूर है
किन लोगों से आपने मदद के लिए संपर्क किया?
मेरे साथ मेरा बेटा था जो मुझे एयरपोर्ट छोड़ने आया था. ज़िंदगी में मेरे ख़ानदान के किसी आदमी के साथ ऐसी दुर्घटना नहीं हुई. मेरा 18 साल का लड़का और बाद में मेरा भाई वहां पहुंच गया.
किसी राजनीतिक पार्टी ने आपकी मदद की?
मैंने किसी राजनीतिक पार्टी से संपर्क नहीं किया. मुझे पूरी तरह से कोई जानकारी भी नहीं थी. मेरा पूरा सामान ज़ब्त था. तो मैं किसी से संपर्क कर भी नहीं सकता था.
मुझे जब थाने ले गए तो मैंने अपने बेटे को फ़ोन किया और उसे पूरी स्थिति बताई.
पिछले 10 वर्षों पर नज़र दौ़ड़ाएं तो इस प्रकार की घटना कोई नई बात नहीं है!
मैं आपको ये बताऊँ कि जहाज़ उड़ने वाला है ये कोई ऐसा वाक्य नहीं है जिसकी पकड़ की जाए.
मुसलमान होना जुर्म, टोपी कुर्ता पहनना जुर्म, लगता है उसी की सज़ा दी जाने की कोशिश की जा रही है.
किसी भी तरह से आलिमों का जुर्म साबित नहीं हो सका, हम मदरसे वाले हैं,
हम अपराध के लिए पैदा नहीं हुए हैं हम तो शांति की शिक्षा देते हैं.
अब आपने क्या सोचा है, सरकार के सामने अपना प्रतिरोध दर्ज करेंगे?
मैं तो रात ही दिल्ली से देवबंद पहुंचा हूं और अभी मैंने कुछ सोचा नहीं है.
कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा है कि ऐमिरेट्स को आपको हर्जाना देना चाहिए.
अगर उन्होंने ऐसा कहा है तो मैं उनको मुबारकबाद देता हूं…..

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औरंगज़ेब आलमगीर


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तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना।
कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।

पुस्‍तक: ‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय‘‘

लेखक: प्रो. बी. एन पाण्डेय, भूतपूर्व राज्यपाल उडीसा, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन एवं इतिहासकार

जब में इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 ई. से 1953 ई. तक) तो मेरे सामने दाखिल-खारिज का एक मामला लाया गया। यह मामला सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद के बारे में था। मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे। एक दावेदार ने कुछ दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे। इन दस्तावेज़ों में शहंशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे। औरंगज़ेब ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था। मैंने सोचा कि ये फ़रमान जाली होंगे। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हो सकता है कि औरंगज़ेब जो मन्दिरों को तोडने के लिए प्रसिद्ध है, वह एक मन्दिर को यह कह कर जागीर दे सकता हे यह जागीर पूजा और भोग के लिए दी जा रही है। आखि़र औरंगज़ेब कैस बुतपरस्ती के साथ अपने को शरीक कर सकता था। मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डा. सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा। वे अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। मैंने दस्तावेज़ें उनके सामने पेश करके उनकी राय मालूम की तो उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं। इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाडी शिव मन्दिर की फ़ाइल लाने को कहा। यह मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था। जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी।

इन दस्तावेज़ों ने औरंगज़ेब की एक नई तस्वीर मेरे सामने पेश की, उससे मैं आश्चर्य में पड़ गया। डाक्टर सप्रू की सलाह पर मैंने भारत के पिभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतो के पास पत्र भेजकर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगज़ेब के कुछ फ़रमान हों जिनमें उन मन्दिरों को जागीरें दी गई हों तो वे कृपा करके उनकी फोटो-स्टेट कापियां मेरे पास भेज दें। अब मेरे सामने एक और आश्चर्य की बात आई। उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की नक़लें मुझे प्राप्त हुई। यह फ़रमान 1065 हि. से 1091 हि., अर्थात 1659 से 1685 ई. के बीच जारी किए गए थे। हालांकि हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के प्रति औरंगज़ेब के उदार रवैये की ये कुछ मिसालें हैं, फिर भी इनसे यह प्रमाण्ति हो जाता है कि इतिहासकारों ने उसके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है और इससे उसकी तस्वीर का एक ही रूख सामने लाया गया है। भारत एक विशाल देश है, जिसमें हज़ारों मन्दिर चारों ओर फैले हुए हैं। यदि सही ढ़ंग से खोजबीन की जाए तो मुझे विश्वास है कि और बहुत-से ऐसे उदाहरण मिल जाऐंगे जिनसे औरंगज़ेब का गै़र-मुस्लिमों के प्रति उदार व्यवहार का पता चलेगा। औरंगज़ेब के फरमानों की जांच-पड़ताल के सिलसिले में मेरा सम्पर्क श्री ज्ञानचंद और पटना म्यूजियम के भूतपूर्व क्यूरेटर डा. पी एल. गुप्ता से हुआ। ये महानुभाव भी औरंगज़ेब के विषय में ऐतिहासिक दृस्टि से अति महत्वपूर्ण रिसर्च कर रहे थे। मुझे खुशी हुई कि कुछ अन्य अनुसन्धानकर्ता भी सच्चाई को तलाश करने में व्यस्त हैं और काफ़ी बदनाम औरंगज़ेब की तस्वीर को साफ़ करने में अपना योगदान दे रहे हैं। औरंगज़ेब, जिसे पक्षपाती इतिहासकारों ने भारत में मुस्लिम हकूमत का प्रतीक मान रखा है। उसके बारें में वे क्या विचार रखते हैं इसके विषय में यहां तक कि ‘शिबली’ जैसे इतिहास गवेषी कवि को कहना पड़ाः

तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना।
कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।

औरंगज़ेब पर हिन्दू-दुश्मनी के आरोप के सम्बन्ध में जिस फरमान को बहुत उछाला गया है, वह ‘फ़रमाने-बनारस’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह फ़रमान बनारस के मुहल्ला गौरी के एक ब्राहमण परिवार से संबंधित है। 1905 ई. में इसे गोपी उपाघ्याय के नवासे मंगल पाण्डेय ने सिटि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया था। एसे पहली बार ‘एसियाटिक- सोसाइटी’ बंगाल के जर्नल (पत्रिका) ने 1911 ई. में प्रकाशित किया था। फलस्वरूप रिसर्च करनेवालों का ध्यान इधर गया। तब से इतिहासकार प्रायः इसका हवाला देते आ रहे हैं और वे इसके आधार पर औरंगज़ेब पर आरोप लगाते हैं कि उसने हिन्दू मन्दिरों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि इस फ़रमान का वास्तविक महत्व उनकी निगाहों से आझल रह जाता है। यह लिखित फ़रमान औरंगज़ेब ने 15 जुमादुल-अव्वल 1065 हि. (10 मार्च 1659 ई.) को बनारस के स्थानिय अधिकारी के नाम भेजा था जो एक ब्राहम्ण की शिकायत के सिलसिले में जारी किया गया था। वह ब्राहमण एक मन्दिर का महंत था और कुछ लोग उसे परेशान कर रहे थे। फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘अबुल हसन को हमारी शाही उदारता का क़ायल रहते हुए यह जानना चाहिए कि हमारी स्वाभाविक दयालुता और प्राकृतिक न्याय के अनुसार हमारा सारा अनथक संघर्ष और न्यायप्रिय इरादों का उद्देश्य जन-कल्याण को बढ़ावा देना है और प्रत्येक उच्च एवं निम्न वर्गों के हालात को बेहतर बनाना है। अपने पवित्र कानून के अनुसार हमने फैसला किया है कि प्राचीन मन्दिरों को तबाह और बर्बाद नहीं किया जाएँ, अलबत्ता नए मन्दिर न बनए जाएँ। हमारे इस न्याय पर आधारित काल में हमारे प्रतिष्ठित एवं पवित्र दरबार में यह सूचना पहुंची है कि कुछ लोग बनारस शहर और उसके आस-पास के हिन्दू नागरिकों और मन्दिरों के ब्राहम्णों-पुरोहितों को परेशान कर रहे हैं तथा उनके मामलों में दख़ल दे रहे हैं, जबकि ये प्राचीन मन्दिर उन्हीं की देख-रेख में हैं। इसके अतिरिक्त वे चाहते हैं कि इन ब्राहम्णों को इनके पुराने पदों से हटा दें। यह दखलंदाज़ी इस समुदाय के लिए परेशानी का कारण है। इसलिए यह हमारा फ़रमान है कि हमारा शाही हुक्म पहुंचते ही तुम हिदायत जारी कर दो कि कोई भी व्यक्ति ग़ैर-कानूनी रूप से दखलंदाजी न करे और न उन स्थानों के ब्राहम्णों एवं अन्य हिन्दु नागरिकों को परेशान करे। ताकि पहले की तरह उनका क़ब्ज़ा बरक़रार रहे और पूरे मनोयोग से वे हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के लिए प्रार्थना करते रहें। इस हुक्म को तुरन्त लागू किया जाये।’’

इस फरमान से बिल्कुल स्पष्ट हैं कि औरंगज़ेब ने नए मन्दिरों के निर्माण के विरूद्ध कोई नया हुक्म जारी नहीं किया, बल्कि उसने केवल पहले से चली आ रही परम्परा का हवाला दिया और उस परम्परा की पाबन्दी पर ज़ोर दिया। पहले से मौजूद मन्दिरों को ध्वस्त करने का उसने कठोरता से विरोध किया। इस फ़रमान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह हिन्दू प्रजा को सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर देने का इच्छुक था। यह अपने जैसा केवल एक ही फरमान नहीं है। बनारस में ही एक और फरमान मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि औरंगज़ेब वास्तव में चाहता था कि हिन्दू सुख-शान्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सकें। यह फरमान इस प्रकार हैः ‘‘रामनगर (बनारस) के महाराजाधिराज राजा रामसिंह ने हमारे दरबार में अर्ज़ी पेश की हैं कि उनके पिता ने गंगा नदी के किनारे अपने धार्मिक गुरू भगवत गोसाईं के निवास के लिए एक मकान बनवाया था। अब कुछ लोग गोसाईं को परेशान कर रहे हैं। अतः यह शाही फ़रमान जारी किया जाता है कि इस फरमान के पहुंचते ही सभी वर्तमान एवं आने वाले अधिकारी इस बात का पूरा ध्यान रखें कि कोई भी व्यक्ति गोसाईं को परेशान एवं डरा-धमका न सके, और न उनके मामलें में हस्तक्षेप करे, ताकि वे पूरे मनोयोग के साथ हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए प्रार्थना करते रहें। इस फरमान पर तुरं अमल गिया जाए।’’ (तीरीख-17 बबी उस्सानी 1091 हिजरी) जंगमबाड़ी मठ के महंत के पास मौजूद कुछ फरमानों से पता चलता है कि

औरंगज़ैब कभी यह सहन नहीं करता था कि उसकी प्रजा के अधिकार किसी प्रकार से भी छीने जाएँ, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान। वह अपराधियों के साथ सख़्ती से पेश आता था। इन फरमानों में एक जंगम लोंगों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) की ओर से एक मुसलमान नागरिक के दरबार में लाया गया, जिस पर शाही हुक्म दिया गया कि बनारस सूबा इलाहाबाद के अफ़सरों को सूचित किया जाता है कि पुराना बनारस के नागरिकों अर्जुनमल और जंगमियों ने शिकायत की है कि बनारस के एक नागरिक नज़ीर बेग ने क़स्बा बनारस में उनकी पांच हवेलियों पर क़ब्जा कर लिया है। उन्हें हुक्म दिया जाता है कि यदि शिकायत सच्ची पाई जाए और जायदा की मिल्कियत का अधिकार प्रमानिण हो जाए तो नज़ीर बेग को उन हवेलियों में दाखि़ल न होने दया जाए, ताकि जंगमियों को भविष्य में अपनी शिकायत दूर करवाने के लिएए हमारे दरबार में ने आना पडे। इस फ़रमान पर 11 शाबान, 13 जुलूस (1672 ई.) की तारीख़ दर्ज है। इसी मठ के पास मौजूद एक-दूसरे फ़रमान में जिस पर पहली नबीउल-अव्वल 1078 हि. की तारीख दर्ज़ है, यह उल्लेख है कि ज़मीन का क़ब्ज़ा जंगमियों को दया गया। फ़रमान में है- ‘‘परगना हवेली बनारस के सभी वर्तमान और भावी जागीरदारों एवं करोडियों को सूचित किया जाता है कि शहंशाह के हुक्म से 178 बीघा ज़मीन जंगमियों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) को दी गई। पुराने अफसरों ने इसकी पुष्टि की थी और उस समय के परगना के मालिक की मुहर के साथ यह सबूत पेश किया है कि ज़मीन पर उन्हीं का हक़ है। अतः शहंशाह की जान के सदक़े के रूप में यह ज़मीन उन्हें दे दी गई। ख़रीफ की फसल के प्रारम्भ से ज़मीन पर उनका क़ब्ज़ा बहाल किया जाय और फिर किसीप्रकार की दखलंदाज़ी न होने दी जाए, ताकि जंगमी लोग(शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) उसकी आमदनी से अपने देख-रेख कर सकें।’’ इस फ़रमान से केवल यही ता नहीं चलता कि औरंगज़ेब स्वभाव से न्यायप्रिय था, बल्कि यह भी साफ़ नज़र आता है कि वह इस तरह की जायदादों के बंटवारे में हिन्दू धार्मिक सेवकों के साथ कोई भेदभाव नहीं बरता था। जंगमियों को 178 बीघा ज़मीन संभवतः स्वयं औरंगज़ेब ही ने प्रदान की थी, क्योंकि एक दूसरे फ़रमान (तिथि 5 रमज़ान, 1071 हि.) में इसका स्पष्टीकरण किया गया है कि यह ज़मीन मालगुज़ारी मुक्त है।

औरंगज़ेब ने एक दूसरे फरमान (1098 हि.) के द्वारा एक-दूसरी हिन्दू धार्मिक संस्था को भी जागीर प्रदान की। फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘बनारस में गंगा नदी के किनारे बेनी-माधो घाट पर दो प्लाट खाली हैं एक मर्क़जी मस्जिद के किनारे रामजीवन गोसाईं के घर के सामने और दूसरा उससे पहले। ये प्लाट बैतुल-माल की मिल्कियत है। हमने यह प्लाट रामजीवन गोसाईं और उनके लड़के को ‘इनाम’ के रूप में प्रदान किया, ताकि उक्त प्लाटों पर बाहम्णें एवं फ़क़ीरों के लिए रिहायशी मकान बनाने के बाद वे खुदा की इबादत और हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए दूआ और प्रार्थना कने में लग जाएं। हमारे बेटों, वज़ीरों, अमीरों, उच्च पदाधिकारियों, दरोग़ा और वर्तमान एवं भावी कोतवालों के अनिवार्य है कि वे इस आदेश के पालन का ध्यान रखें और उक्त प्लाट, उपर्युक्त व्यक्ति और उसके वारिसों के क़ब्ज़े ही मे रहने दें और उनसे न कोई मालगुज़ारी या टैक्स लिया जसए और न उनसे हर साल नई सनद मांगी जाए।’’ लगता है औरंगज़ेब को अपनी प्रजा की धार्मिक भावनाओं के सम्मान का बहुत अधिक ध्यान रहता था।

हमारे पास औरंगज़ेब का एक फ़रमान (2 सफ़र, 9 जुलूस) है जो असम के शह गोहाटी के उमानन्द मन्दिर के पुजारी सुदामन ब्राहम्ण के नाम है। असम के हिन्दू राजाओं की ओर से इस मन्दिर और उसके पुजारी को ज़मीन का एक टुकड़ा और कुछ जंगलों की आमदनी जागीर के रूप में दी गई थी, ताकि भोग का खर्च पूरा किया जा सके और पुजारी की आजीविका चल सके। जब यह प्रांत औरंगजेब के शासन-क्षेत्र में आया, तो उसने तुरंत ही एक फरमान के द्वारा इस जागीर को यथावत रखने का आदेश दिया। हिन्दुओं और उनके धर्म के साथ औरंगज़ेब की सहिष्ण्ता और उदारता का एक और सबूत उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर के पुजारियों से मिलता है। यह शिवजी के प्रमुख मन्दिरों में से एक है, जहां दिन-रात दीप प्रज्वलित रहता है। इसके लिए काफ़ी दिनों से पतिदिन चार सेर घी वहां की सरकार की ओर से उपलब्ध कराया जाथा था और पुजारी कहते हैं कि यह सिलसिला मुगल काल में भी जारी रहा। औरंगजेब ने भी इस परम्परा का सम्मान किया। इस सिलसिले में पुजारियों के पास दुर्भाग्य से कोई फ़रमान तो उपलब्ध नहीं है, परन्तु एक आदेश की नक़ल ज़रूर है जो औरंगज़ब के काल में शहज़ादा मुराद बख़्श की तरफ से जारी किया गया था। 5 शव्वाल 1061 हि. को यह आदेश शहंशाह की ओर से शहज़ादा ने मन्दिर के पुजारी देव नारायण के एक आवेदन पर जारी किया था। वास्तविकता की पुष्टि के बाद इस आदेश में कहा गया हैं कि मन्दिर के दीप के लिए चबूतरा कोतवाल के तहसीलदार चार सेर अकबरी घी प्रतिदिन के हिसाब से उपल्ब्ध कराएँ। इसकी नक़ल मूल आदेश के जारी होने के 93 साल बाद (1153 हिजरी) में मुहम्मद सअदुल्लाह ने पुनः जारी की। साधारण्तः इतिहासकार इसका बहुत उल्लेख करते हैं कि अहमदाबाद में नागर सेठ के बनवाए हुए चिन्तामणि मन्दिर को ध्वस्त किया गया, परन्तु इस वास्तविकता पर पर्दा डाल देते हैं कि उसी औरंगज़ेब ने उसी नागर सेठ के बनवाए हुए शत्रुन्जया और आबू मन्दिरों को काफ़ी बड़ी जागीरें प्रदान कीं।

मन्दिर तोड़ने की घट्ना

निःसंदेह इतिहास से यह प्रमाण्ति होता हैं कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था। विश्वनाथ मन्दिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि वहा। क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा दनी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ जी के मन्दिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएँगी। औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडाव से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया। रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बडी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका। जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा। आखिर में उन अफ़सरों ने देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है। उन्होंने मूर्ति हटवा कर देख तो तहखाने की सीढी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी। उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे। यह तहखाना विश्वनाथ जी की मूर्ति के ठीक नीचे था। राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोघ प्रकट किया। चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई कने की मांग की। उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है। अतः विश्नाथ जी की मूर्ति को कहीं और लेजा कर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाए और महंत को गिरफ्तार कर लिया जाए। डाक्टर पट्ठाभि सीता रमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है। पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डा. पी. एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुस्टि की है।

मस्जिद तोड़ने की घटना

गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालगुज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे। कुछ ही वर्षों में यह रक़म करोड़ों की हो गई। तानाशाह न यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में गाड़ कर उस पर मस्जिद बनवा दी। जब औरंज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दे दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए। अतः गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों मकें ख़र्च किया गया। ये दोनों मिसालें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था। ‘‘दर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा, और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और मनगढंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी साम्प्रदायिक एवं स्वार्थी तत्व इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने और उसे ग़लत रंग देने में लगे हुए हैं।

साभार पुस्तक ‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय‘‘ प्रो. बी. एन पाण्डेय, मधुर संदेश संगम, अबुल फज़्ल इन्कलेव, दिल्ली-2

AURANGZEB


Aurangzeb mughal itihas me sabse badnam shasak hain jiska kaaran ye bataya jata hai kiwo kattar muslim thy . . . 
 
 
 
lekin jab ham dhyan se itihas padh te hain to pate hain Aurangzeb r.a. ne Sati pratha ko apne shasan me band karwa ke anginat maasoom aurato ki jaan bachai thi is ke saath Aurangzeb r.a. ne apne rajya me Daas wyapar pe rok lagaai . 
 
 
Bazaro me Jua khelne aur khule aam Sharab peene pe rok laga dithi ,
 
 
 apne rajya me Veshyavritti pe rok laga di thi, 
 
 
rajya me bhang ki kheti pe rok laga di thi aur ek sath 80 taxes ko maaf kr dia tha jinme hinduo pe laga teerth yatra tax bhi maaf kr dia tha . 
 
 
aurangzeb r.a. ne apne darbar me pury mughal period ke mukable sabse zyada 33% hindu man sabdar rakhe thy aur unhone Jyotish sangeet etc.mahal ke faltu kharco pe rok laga di thin . . . . . 
 
ye tathya bharat sarkar dwara manyata prapt kitabo me milte hain 
 
jaise Dr. Laeek ahamad ki likhi kitab 
 
MUGAL KALEEN BHARAT, page: 177-178
 
aur Harishchandra Varma ki likhi kitab 
 
MADHYA KALEEN BHARAT, page: 147 
 
isi tarah NCERT ki 12th class ke liye kitab 
 
 BHARTEEY ITIHAS KE KUCH VISHAY-2 me 
 
 
Bhatki Sufi Paramparaye Page: 149 pe likha hai
 
”shasako ne bhumi anudan aur kar ki Chhoot hindu, jain, parsi, isaai aur yahoodi dharm Sansthaao ko di sath he ghair muslim dharmik netaao ke prati shraddha bhav wyakt kiya ! aise anudaan anek mugal badshah, jinme Aurangzeb shamil thy dwara diye gye”
 
Page 150 srot 6 me

Aurangzeb r.a. dwara ek jogi ko likhe huyepatr ka ansh dia hai

Wo Patra is tarah h

”Buland maQaam Shivmurat guru anand nathjiyo/ Janab e muhtaram, aman aur khushi se hamesha shri shiv jiyo ki panah me rahen. Poshak keliye vastr aur 25 rupay ki raqam jo bhent ke taur par bheji gai aap tak pahochegi. janab e muhtaram aap hame likh sakte hain jab bhi hamari madad ki zarurat ho”

 
Page 234 
 
”Yuddh ke dauran agar mandir nasht ho jate thy tobaad me unki marammat ke liye anudaan jaari kiye jate thy aisa hame Shahjahan aur Aurangzeb ke shasan kaal me pata chalta hai”
 
 
in facts se pata chal jata ki kattar muslim Kise kahte h

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Bismillahirrahmanirraheeem
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KYA NABI SALLALLAHU ALAIHI WASALLAM NE ALLAH KO DEKHA HAI??


Bismillahirrahmanirraheem

KYA NABI SALLALLAHU ALAIHI WASALLAM NE ALLAH KO DEKHA HAI??
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Yeh Janne se pahle ke Aima ka raajeh mauqif kya hai in baaon par ghaur farmalein:

1) KYA NABI KAREEM SAW NE ME’RAAJ WAALI RAAT ALLAH RABBUL IZZAT KO DEKHA?

2) KYA NABI KAREEM SAW NE HAAL-E-KHAWAAB ME ALLAH TA’AL KO DEKHA?

3) KYA DUNIYA ME ALLAH TA’ALA KO DEKHA JAA SAKTA HAI?

1)

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ME’RAAJ WAALI RAAT DEEDAAR-E-ILAAHI:
===========================

 Me’raaj waali raat nabi kareem saw ne duniya ki zaahiri aankh se deedar-e-ilaahi nahi kiya,
jaisa ke

a)
Sayyadna Abu Zar Giffari rz bayan karte hain:

“main ne Rasul Allah sallallahu alaihi wasallam se sawal kiya:
Kya aapne ne apne Rabb ko dekha?

farmaya: wo to Noor hai, main ise kaise dekh sakta hun.

(Sahih Muslim: 1/99, H: 178)

sahih Muslim ki is riwayat me RAAYAT NOORA ke alfaaz bhi hain jinka matlab bayan karte he 

IMAM IBN HIBBAN ra. farmate hain:

iska matlab hai Aap saw ne Apne Rabb ko nahi dekha balke makhlookh (farishto) ke nooron me se ek buland noor dekha tha.

(sahih IBn Hibban, tahet-e-hadees: 5)

b)

Sayyada Aaisha rz farmatin hain:

JO AAPKO YE BAYAN KARE KE MOHAMMED SALLALLAHU ALAIHI WASALLAM NE APNE RABB KO DEKHA THA WO JHOOT BOLTA HAI:

(sahihh Bukhari: 2/720, H. 4855, Sahih Muslim: 1/98, H: 177)

sayadna IBN Abbas Rz ka qaul hai:

“yaqeenan Allah ta’ala ko nabi kareem sallallahu alaihi wasallam ne dekha hai:

(sunan tirmizi: 3280, wa qala hasan, sunnat ibn abi asim: 1/19, tafsire tabri 27/52, kitabut tawheed ibn khuzaima: 1/490 wa sanad hasan)

  IS QAUL KE BAARE ME Shaikhul islam ibn taimiya raz farmate hain:

darasal ye ta’arruz nahi hai kyunki Sayadna ibn Abbas rz ne ye nahi farmaya ke nabi kareem saw ne Allah ko apne Sar waali do aankho se dekha hai”

(aijtema jiyoshul islamiya ibn qayyim: page 48)

aur farmate hain:

koi daleel aisi nahi jiska ye taqaza ho ke Aap saw ne Allah ta’ala ko Apni Aankho se dekha hai: na ye sahaba kiram me se kisi se saabit hai na kitab wa sunnat me koi aisi daleel hai. iske bar-aks sahihh nusus iski nafi me ziyadah waaze hai.

(majmual fatawa ibn taimiya: 6/509,510)

HAAFIZ IBN KASIR RA FARMATE HIAN;

Nabi kareem saw ke Allah ko dekhne ke baare me jo kuch manqool hai wo na nabi kareem saw se saabi hai na sahaba kiram rz se:

(al fusul fi sirat rasul: p. 268)

nez farmate hain:

Sayadna IBn Abbas rz se ek riwaya hai ke unhone Nabi Kareem saw ke Allah ko dekhne ke lafz istemaal farmaye hain: unki ye baad dil ke saath dekhne se muqayyid ki jaayegi.
jis ne aankho ke saath dekhne wali riwayat bayan ki hai us ne munkir baat ki hai kyunki is baare me sahaba kiram se kuch saabit nahi:

(tafsir ibn kaseer: 6/23-24)

IMAM IBN ABI IZZA HANFI RA. is baare me farmate hian:

sahih baat ye hai ke nabi kareem saw ne Allah ta’ala ko Apne dil ke saath dekha tha, sar ki aankh se nahi dekha:

farmane-e-baare ta’ala “MA KAZABA ALFUADU MA RAA’YA (NAJM 53:11) DIL NE JO DEKHA THA USE JHUTLAYA NAHI,
WALAQAD RAAHU NAZLATAN UKHRA 

(NAJM 53: 13)

(YAQINAN AAP SAW NE USE DUSRI DAFA DEKH THA) KE baare me nabi saw se sahih saabit hai ke yahan jis cheez ko dekhne ka zikr hai wo Jibrail as. hain: Aap saw ne JIbrail as ko 2 dafa unki soorat me dekha hai jis me wo paida kiye gaiye the:

(sharah aqeeda tahawiya ibn abil izz hanfi: 1/275)

aur likhte hain:

lekin nabi kareem saw ke Allah ta’ala ko Apne sar ki Aankh k saath dekhne ke bare me ki dalil nahi milti, Albatta Aap saw ke Allah ta’ala ko na dekhne ke baare me dalaail milte hain”

((sharah aqeeda tahawiya ibn abil izz hanfi: 1/222)

IBN HAJAR RA. LIKHTE HIAN:

sayadna ibn Abbas rz se kuch riwayat mutlaq aai hain aur kuch muqayyid.
zaruri  hai ke mutlaq riwayat ko muqayyid riwayat par mahmul kiya jayee…
yun sayadna ibn abbas rz ke asbaat aur sayada aaisha rz ki nafi me is tarah tatbeeq mumkin hai ke sayada aaisha rz ki nafi aankhon ki ru’yat par mahmul kiya jaye aur sayadna ibn abbas rz ke asbaat ko dil ki ru’yat apr mahmul kiya jaaye.
Phir dil ke dekhne se dekhna hi muraat hai na ke sirf janna, kyunkii nabi kareem saw hamesha Allah ko jaante the. jinhone nabi akram saw ke liye dil ke saath Allah ko dekhne ka asbaat kiya hai unki muraat ye hai ke jis tarah Aam logo ki Aankh me ru’yat paida ki jaati hai aise hi ap saw ke dil mu ru’yat paida ki gai.

aqli taur par ru’yat ke liye koi khaas shart nahi agarcha aadat ye hai ke ye aankh me hi paida hoti hai.

(fatahul baari ibn hajar: 8/484)

======
FAAIDA:
======

farmane baari

surah najm53: 10)

pas wo (nabi kareem saw) do kamaano ke darmiyani fasle par tha ya is se bhi qareeb. phir usne uske bande ki taraf wo wahi ki jo usne wahi ki thi(
se muraat jibrail as hain.

jaise ke hafiz ibn kaseer ra likhte hain:

yani jab jibrail as MOhammmed saw par zameen ki taraf utre to itne qareeb hue ke JIbrail as aur Mohammed saw ke darmiyan do kamano ke darmiyan faasle jitna fasla bhi na raha.

(tafseer ibn kaseer 6/22, ba tahqiq abdur razaq mahdi)

aur likhte hain:

isi tarah ye ayat (53:9) (yani yahan jibrail as muraad hai)

aur hum ne jo kaha ke Mohammed saw ke bahot ziyadah qareeb hone waale jibrail as hi the to ye Ummul mominin Sayada aaisha rz , Sayadna Abdullah ibn Masood rz, sayadna Abu zar rz aur Sayadna Abu hurairah rz ka farman hai”

(tafseer ibn kaseer: 6/32)

farman baari ta’ala hai:

(surah najm53: ayat 9-10) ki tafsir me sayadna Abdullah ibn masood raz farmate hain:

“Is se muraad JIbrail as hain”

(sahih Bukhari: 2/720: H: 4856, Sahih Muslim: 1/97: H: 174)

HAASIL KALAAM YE HAI KE sayda Aisha rz ne jis ru’yat ki nafi ki hai, iska talluk duniya ki zahiri aankh se hai, yani unke mutabiq wo shaks jhoota hai jo ye da’awa karta hai ke rasul saw ne Allah ko apni zahiri aankho se dekha hai:

sayadna ibn abbas rz jis dekhne ko saabit karte hain wo dil se dekhna hai,

is tarah don aqwaal me tatbeeq ho jati hai. jo log zahiri aankh se rasul saw ka Allah ko dekhna saabit karte hain unka qaul marjoo hai.

======

FAIDA:
======

farmane baari ta’ala (surah najm 53 ayat 10) ke baare me

Hafiz ibn kaseer ra farmate hain:
iska maani ye hai ke jibrail as ne Allah ke bande Mohammed saw ki taraf jo wahi karna thi kardi ya Allah ne Apne bande Mohammed saw ki
taraf jo wahi karna thi, jibrail ke waaste se kardi, ye dono maani durust hain:

(tafseer ibn kaseer: 6/23)

========

AL-HAASIL:
========

NABI AKRAM SALLALLAHU ALAIHI WASALLAM NE ME’RAJ WALI RAAT ALLAH KO NAHI DEKHA. ISKE KHILAF KUCH SAABIT NAHI.

2)
=======================================

NABI KAREEM SAW KA HAALAT-E-NEEND ME DEEDAR-E-ILAAHI:
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aima ahle sunnat is baat ke qail hain nabi akram saw ne haalat-e-neend me Allah ta’ala ko dekha hai.

sayadna mu’aaz bin Jabal rz se riwayat hai ke ek din Namaz-e-subh ke baad rasul saw ne apne khawaab bayan karte hue farmaya:

“Achanak Maine Apne Rabb ko haseen tareen soorat me dekha’

(masnad imam ahmed 5/243 sanad sahih)

shaikhul islam ibn taimiya rh is bare me farmate hain:

ye dekhna me’raj wale waqiye me nahi balke madina munawwarah me tha jab aap saw subah ki namaz me aane se late ho gaye the.

phir aap saw ne sahaba kiram rz ko is raat Allah ko neend me dekhne ke baare me bataya.
isi bina par imam ahmed rh ne farmaya ke Rasul saw ne Zarur Allah ko dekha hai kyunki ambiya-e-kiram ke khawaab yaqinan wahih hote hian:

(zaadul maad ibn qayyim 3/37)

aur farmate hain:

malum hua ke ye waqiya madina munawarah me neend ke dauran ka hai, meraj ki raat bedaari ka nahi.

(majmual fatawa 3/387, 388)

3)
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KISI NE DUNIYA ME ALLAH TA’ALA KO NAHI DEKHA:
================================

 kisi ne Duniya me Allah ta’ala ko nahi dekha:

ye ahle sunnat wal jamat ka ittefaaqi wa ijmaai aqeeda hai.

jaisa ke IMAM USMAN BIN SAYEED DARMI RA. farmate hain:

“tamam aima kiram yahi kahte hain ke Allah ko duniya me na dekha gaya na duniya me ise dekha ja sake ga.

(al radd alal jahmiya lil darmi: 124)

shaikhul islam ibn taimiya r. farmate hain:

Musalmano ka is baat par ittefaaq hai ke nabi akram saw ne zameen me apni aankho se Allah ko nahi dekha:

(majmual fatawa ibn taimiya: 3/388)

 Imam ibn Abil Izz hanfi ra likhte hain:

Ummate muslima is baat par ittefaaq kiya hai ke duniya me koi apni aankho se Allah ko nahi dekh sakta.

(sharah aqeeda tahawiyah ibn abi izz hanfi 1/222)

Rasul saw ka farman hai:

“jaan lo ke tum me se koi bhi marne se pahle Allah ko nahi dekh sakta:

(sahih Muslim: 2/399: H. 169)

sayadna abu imama bahli rz bayan karte hain ke rasul saw ne hame dajjal ke bare me khutba diya aur farmaya:

“wo kahega ke main tumhara rabb hun, halanki tum maut se pahle apne rab ko nahi dekh sakte:

(as sunnat ibn abi aasim: 400 sanad hasan, …)

=======

AL-HAASIL:
=======  

NABI KAREEM SALLALLAHU ALAIHI WASALLAM NE ME’RAJ WAALI raat ALLAH KO NAHI DEKHA.

ALBATTA MADEENA MUNAWARRAH ME HAALAT-E-NEEND ME ALLAH KA DEEDAR KIYA HAI:

AUR YE SHARF RASUL SAW KO HAASIL HAI:
ALHAMDULILLH

MAKKAH MADINA WALO SE AAL-E-DEOBAND KE SHADEED IKHTILAAF


Bismillahirrahmanirraheem

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MAKKAH MADINA WALO SE AAL-E-DEOBAND KE SHADEED IKHTILAAF
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1. makke aur madeene walo k nazdeek sirf Allah hi mushkil kusha hai.
AAL-E-DEOBAND K NAZDEK ALI RAZ. MUSHKIL KUSHA HIA. (DEKHIYE KULLIYAT-E-IMDADIYA P. 103)

2.

1. makke aur madeene walo k nazdeek wahdatul wajood ka aqeedah shirk hai
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK wahdatul wajood ka aqeedah haq aur sahih hai (dekhiye kulliyat-e-imdadiya page 218)

3.

makke aur madeene walo k nazdeek qabr parasti shirk hai.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK qabr ki mitti se shifa hoti hai. (dekhiye HIKAYAT-E-AULIYA, HIKAYAT NO. 366)

4.
makke aur madeene walo k nazdeek KASHTI KINARE LAGANE WALA SIRF ALLAH HAI.
AAL-E-DEOBAND KAHTE HAIN K “MERI KASHTI KINARE PAR LAGAO YA RASUL ALLAH” (DEKHIYE KULLIYAT-E-IMDADIYA PAGE 205)

5.
makke aur madeene walo k nazdeek Rasul saw Rahmatul aalameen hain.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK HAJI IMDADULLAH RAHMATUL AALAMEEN HAI. (DEKHIYE QASASUL AKAABIR PAGE 69)

6. makke aur madeene walo k nazdeek BANDA KABHI KHUDA NAHI BAN SAKTA.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK (BANDA BAAZ AUQAAT) ZAHIR ME BANDA AUR BAATIN ME KHUDA HO JATA HAI. (DEKHIYE KULLIYAT-E-IMDADIYA PAGE 35-36)

7.
makke aur madeene walo k nazdeek HAQ WAHI HAI JO QURAN WA HADIS ME HAI.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK HAQ WAHI HAI JO RASHID AHMED GANGUHI KI ZUBAAN SE NIKALTA HAI. (DEKHIYE TAZKIRATUR RASHEED J. 2, PAGE 17)

8.
makke aur madeene walo k nazdeek AAJIZON KI DASTAGIRI AUR BE-KASO KI MADAD KARNE WALA SIRF ALLAH HAI.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK AAJIZON KI DASTAGIRI AUR BE-KASO KI MADAD KARNE WALE RASUL SAW HAI. (DEKHIYE FAZAIL-E-DAROOD PAGE 137)

9.

makke aur madeene walo k nazdeek AULIYA K PAAS ILM-E-GHAIB NAHI HOTA.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK AULIYA K PAAS ILM-E-GHAIB HOTA HAI. (DEKHIYE SHUMAIL-E-IMDADIYA PAGE 61)

10.

makke aur madeene walo k nazdeek SHAIKH MOHAMMED BIN ABDUL WABAB IMAM, MUJADDID, MUHAHID AUR NEK AALIM THE.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK MOHAMMED BIN ABDUL WAHAB ZAALIM WA BAAGHI KHUNKHAWAAR SHAKS THA!!!!! (DEKHIYE AS-SHAHABUS SAAQIB. PAGE 42)

11.

makke aur madeene walo k nazdeek MOHAMMED BIN ABDUL WAHAB RA. AHLE SUNNAT ME SE THE.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK MOHAMMED BIN ABDUL WAHAB KHAARJIYON ME SE THE (DEKHIYE ALMAHIND PAGE 46)

12.

makke aur madeene walo k nazdeek GHAUS-E-AAZAM SIRF EK ALLAH HAI.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK SHAIKH ABDUL QADIR JEELANI RA. GHAUS-E-AAZAM HAIN. (DEKHIYE ASHRAM ALI THANWI KI KITAAB: TALEEM-E-DEEN PAGE 18)

13.

makke aur madeene walo k nazdeek RASUL SAW WAFAAT PAAKAR DUNIYA SE CHALE GAYE HAIN.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK RASUL SAW DEENWI TAUR PAR ZINDAAH HAIN. 

(DEKHIYE AAB-E-HAYAAT PAGE 27, 36)

14. makke aur madeene walo k nazdeek ALLAH TA’ALA APNE ARSH PAR HAI.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK ALLAH TA’ALA HAR JAGAH MAUJOOD HAI. (DEKHIYE MALFOOZAT FAQIYAL UMMAT J. 2, PAGE 14)

15.

makke aur madeene walo k nazdeek ALLAH TA’ALA KI SIFAAT MASLAN HAATH WAGAIRA PAR TASHBEEH AUR TAWEEL K BAGAIR IMAAN LANA ZAROORI HAI.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK HAATH SE MURAAD QUDRAT HAI. (DEKHIYE 
ALMUHAND PAGE 48)

16.

makke aur madeene walo k nazdeek SOOFIYON KI KITAAB DALAILUL KHAIRAT QABIL-E-AITEMAD NAHI HAI.

AAL-E-DEOBAND K NAZDIK DALAILUL KHAIRAT KA PADHNA BAAIS-E-SAWAAB HAI. 

(DEKHIYE ALMUHIND PAGE 41-42)

17.

Makke aur madeene walo k nazdeek ALLAH SE DUA ME AMBIYA WA AULIYA KA WASILA JAAYAZ NAHI.

AAL-E-DEOBAND K NAZDIK ALLAH SE DUA ME AMBIYA WA AULIYA KA WASILA JAAYAZ HAI (DEKHIYE ALMUHAND PAGE 37)

18.

Makke aur madeene walo k nazdeek RASUL SAW AAKHRI NABI HAI.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK :AGAR BILFARZ BAAD ZAMANA NABWI SAW KOI NABI PAIDA HUA TO PHIR BHI KHATIMIYAT MUHAMMADI ME KUCH FARQ NAHI AAYEGA” (DEKHIYE TAHZEERUN NAAS PAGE 85)

19.

Makke aur madeene walo k nazdeek MAZHAB BANAKAR DEOBANDI KAHELANA JAYAZ NAHI HAI.
AAL-E-DEOBAND K NAZDIK DEOBANDI KAHELANA JAAYAZ BALKE BAAIS-E-FAKHR HAI.

20.

makke aur madeene walE GARMIYON ME BHI ZOHAR KI NAMAZ AWWAL WAQT ME PADHTE HAIN.

AAL-E-DEOBAND GARMIYA HO YA SARDI ZOHAR KI NAMAZ HAMESHA BAHOT LET KARKE PADHTE HAIN.

21.

Makke aur madeene walE ASAR KI NAMAZ EK MISL PAR PADHTE HAI.
AAL-E-DEOBAND ASAR KI NAMAZ DO MISL K BAAD PADHTE HAIN.

22.

Makke aur madeene walE MAGHRIB KI AZAN K BAAD 2 RAKATO KA WAQT DETE HAIN.
AAL-E-DEOBAND MAGHRIB KI AZAN K BAAD 2 RAKATO KA WAQT KABHI NAHI DETE.

23.

Makke aur madeene walE akahri iqaamat kahete hain.
AAL-E-DEOBAND dohari iqaamat kahete hain.

24.

Makke aur madeene walE k nazdeek kabaa (baitullah) har waqt apni jagah par raheta hai.
AAL-E-DEOBAND k nazdeek kabaa (baitullah) baaz buzurgo ki ziyaarat ko jaata hai. (dekhiye fazaail-e-Hajj Page 111)

25.

Makke aur madeene walE subha ki namaaz andhere me padhte hain.
AAL-E-DEOBAND subha ki namaz andhere me nahi padhte balike roshni me padhte hain.

26.

Makke aur madeene walE farz namaaz k baad ijtemaai dua nahi karte
AAL-E-DEOBAND farz namaaz k baad hamesha ijtemaai dua karte hain.

27.

Makke aur madeene walE rafayadain karte hain.
AAL-E-DEOBAND rafayadain k sakht khilaaf hain.

28.

Makke aur madeene walE namaz janaza me surah fatihaa padhte hain.
AAL-E-DEOBAND namaz janaza me surah fatiha nahi padhte.

29.
Makke aur madeene walE aamin biljaher (zor se aamin) kahete hain.
AAL-E-DEOBAND aamin biljahere se sakht chid aur hasad rakhte hue mana karte hain.

30.

Makke aur madeene walE ek rakat witr padhte hain.
AAL-E-DEOBAND ek witr k sakht mukhaalif hain.

31.

Makke aur madeene walE iqaamat hone k baad sunnatein nahi padhte
AAL-E-DEOBAND iqaamat hone k baad bhi sunnatein padhte hain.

32.

Makke aur madeene walE ek salaam se 3 witr nahi padhte
AAL-E-DEOBAND ek salaam se maghrib ki tarah mushabehat karte hue 3 witr hamesha padhte hain.

33.

Makke aur madeene walE namaz janaza me namaz wala darood padhte hain.
AAL-E-DEOBAND rahmat witrahamat wala khudsakhta darood padhte hain.

34.

Makke aur madeene walE witr me duaa ki tarah haath utha kar qunoot padhte hain.
AAL-E-DEOBAND qunoot witr me dua ki tarah haath utha kar kabhi qunoot nahi padhte.

35.

Makke aur madeene walo k nazdeek pakhana najis aur paleed hai.
AAL-E-DEOBAND k peer k nazdeek mohid k liye pakhana khana waajib hai. (dekhiye IMDADUL MUSHTAAQ PAGE 101, FIQRA 224)

36.

Makke aur madeene walE AURTO KO MASJID ME NAMAZ PADHNE SE BILKUL BANA NAHI KARTE
AAL-E-DEOBAND K NAZDEEK AURTO K LIYE MASJID ME NAMAZ PADHNA MAMNOO HAI.

37.

Makke aur madeene walE JUMA K SIRF 2 KHUTBE DETE HAIN.
AAL-E-DEOBAND JUMA KE 3 KHUTBE DETE HAIN. EK URDU ME AUR 2 ARABI ME.

38.

Makke aur madeene walE NAMAZ JUMA HAMESHA AWWAL WAQT ME PADHTE HAIN.
AAL-E-DEOBAND NAMAZ HAMAESHA LATE KARKE PADHTE HAIN.

39.

Makke aur madeene walE HALAT-E-KHUTBA ME 2 RAKATE PADHTE HAIN.
AAL-E-DEOBAND HALAT-E-KHUTBA ME 2 RAKATE PADHNE K SAKHT MUKHAALIF HAIN.

IS SE MALOOM HUWA K MAKKA AUR MADINA WALO SE AAL-E-DEOBAND (DEOBANDIYO) K SHADEED IKHTELAFAAT HAIN AUR SAUDI K ULEMA KO DEOBANDI “ULEMA” APNA BHAI NAHI MAANTE.

SARFARAZ KHAN SAFDAR DEOBANDI NE LIKHA 

“MUFTI SAHAB KO MALOOM HONA CHAHIYE K DEOBANDI BADE PAKKE HANAFI HAIN AUR NAJADI ULEMA BAAZ TO HAMBALI HAIN AUR BAAZ GHAIR MUKALLID HAIN WO IS MASLAK K AITEBAAR SE HAMARE BHAI KAISE HUWE?” 

(BAAB-E-JANNAT PAGE 194)

AUR LIKHA SARFARAZ KHAN NE:

“BILA SHAK HARMAIN SHARIFAIN KI NUSOOS SE BADI FAZEELAT AUR RUTBA SAABIT HAI. LEKIN SHARAI DALAIL SIRF 4 HAIN JINKA ZIKR HO CUKHA. AGAR HARMAIN SHARIFAIN ME ACHCHE KAAM HOO TO NURUN NURALA, WARNA HARGIZ HUJJAT NAHI HAIN”

(RAAH-E-SUNNAT PAGE 167),,,,,,,,,

BUKHARI WA MUSLIM SHAREEF MUQALLIDEEN KI NAZAR MEIN


Bismillahirrahmanirraheem

BUKHARI WA MUSLIM SHAREEF MUQALLIDEEN KI NAZAR MEIN
=================================

1)

 BADRUDDIN AINEE HANAFI LIKHTE HAIN:

“SHARQ WA GHARB ke ulema ka ispar ITTEFAAQ hai ke KITAABULLAH k baad BUKHARI wa MUSLIM se ziyada sahih koi kitaab nahi hai, AUR JAMHOOR NE SAHIH BUKHARI ki sehat ko SAHIH MUSLIM PAR TARJEEH DI HAI”

(Muqaddima Umdatul Qaari Sharah Sahih Bukhari: 1/24)

– BADRUDDIN AINEE HAN MAZEED FARMATE HAIN:

“Yani Salaf wa Khalaf ke Ulema Sahih Bukhari ki Maqbooliyat par Muttafiq hain” 

(Umdatul Qaari: 1/20)

2)

 MULLA ALI QAARI HANAFI LIKHTE HAIN:

“ulema ka is baat par ittefaaq hai ke saheyeen ko talqi bilqabool haasil hai aur taleef karda kutub me SE bukhari wa muslim sab se ziyadah sahih hain. 

(Marqaatul Mufaateeh: 1/598)

-mazeed likhte hain:

“wo quran majeed ke baad sahih tareen kitab hai” 

(Marqaatul Mufaateeh: 1/59)

3)

SAYYAD SHAREEF JARJANI HANAFI LIKHTE HAIN:

“Yani Sirf Ahadees Saheeya par mushtamil Imam Bukhari ne sab se pahle kitab tasneef ki, phir Muslim inke nakhse qadam par chale aur ye dono ditaabein KITABULLAH ke baad sabse ziyadah saheeh hain.” 

(Risala Usool Hadees lijarjaani: 1)

4)

 MOHAMMED MUEEN SINDHI HANAFI LIKHTE HAIN:

“AASMAN KE CHHAT KE NEECHE SIRF SEHAT ME IN DONO (BUKHARI WA MUSLIM) ka ashal kutub hona aur QURAN AZEEZ K baad in dono ka ashal kutub hona EK IJMAAI BAAT HAI” 

(DARASAAT LILBEEB: 284)

5)

SHABBIR AHMED USMANI HANAFI LIKHTE HAIN:

“YANI sab se pahle sirf ahaadees saheeya par jis ne koi tasneef tayar ki, wo imam bukhari hain, phir inke nakshe qadam ki pairwi imam muslim ra. ne ki aur ye dono kitabe musannifaat hadees me sabse ziyada saheeh kitabe hain”

(fATEHUL MULHAM SHAHRAH MUSLIM: 54)

6)

 ABUBAKAR GHAAZEEPURI HANAFI LIKHTE HAIN:

“Imam bukhari ra. ka yahi bahot bada karnama hai ke inho ne lakhon hadiso me se muntakhib majmuaa tayar kardiya hai, jisko ummat me talqee wa qabool aam hasil hua, aur ahaadees ki maujooda kitabo me se ummat ne isko sab se saheeh kitab qarar diya” 

(ARMAGHAN-E-HAQ: 291)

Note: talqee bilqabool k bare me AMEEN OKARWI HANAFI LIKHTE HAIN:

“jis hadees ko talqee bilqabool naseeb ho, wo agar quran ke bhi khilaaf ho to amal jaayaz hai” 

(majmuaa rasaail okarwi: 1/227)

Note: ye ahnaaf ka qayda hai k hadis quran ke khilaf bhi ho, halanki koi sahih hadis quran ke khilaf nahi hotsakti, kyunki inme mutabiqat zarur payi jati hai.

7)

SARFARAZ SAFDAR HANAFI LIKHTE HIAN:

“SAHEEYEEN (BUKHARI WA MUSLIM) ME JO RAWAAYAT HAIN WO SAHEEH HAIN”

(KHAZAAIN-E-SUNAN: 2/111)

8)

 ALLAMA ZAILEE HANAFI LIKHTE HAIN:

“HUFFAZ HADIS KE NAZDIK SAB SE AALA DARJE KI HADIS WO HAI, JIKI RIWAYAT PAR BUKHARI WA MUSLIM KA ITTEFAQ HO”

(NASBUR RAAYA: 1/421)

9)

 AHMED ALI SAHARANPURI HANAFI LIKHTE HAIN:
ULEMA KA ITTEFAAQ HAI KE LIKHI HUI KITABO ME SE SAB SE ZIYADA SAHIH BUKHARI WA MUSLIM HAIN, AUR JAMHOOR KA ISPAR ITTEFAAQ HAI KE MUSLIM SE BUKHARI ZIYADAH SAHIH HAI AUR ISME FAAYDE BHI ZIYADA HAIN”

(MUQADDIMA SAHIH BUKHARI: 1/4)

-MAZEED LIKHTE HIAN:

“Ummat ka sahih bukhari wa sahih muslim har do kitabo ki sahet par qataee ijmaa hochuka hai” (MUQADDIMA SAHIH BUKHARI: 1/4)

10) MOHAMMED ISMAAIL SANBHALI HANAFI LIKHTE HIAN:

“DUNIYA JAANTI HAI KE SAHIH BUKHARI AISI BENAZEER KITAB HAI K KUTUB HADIS ME ASHAL KUTUB MAANI GAYI HAI AUR ISPAR DUNIYA KA ITTEFAAQ HAI”

(Taqleed aima aur muqaam abu hanifa (ra): 152)

11)

SHAH WALIULLAH DEHLWI HANAFI LIKHTE HAIN:

“SAHIH BUKHARI WA MUSLIM KE bare me tamam muhaddisin muttafiq hain ke inme tamam ki tamam MUTTASIL AUR MARFOO AHADEES YAQINAN SAHIH HAIN AUR YE DONO KITABE APNE MUSANNIFIN TAK BIT TAWATIR PAHONCHI HAI, JO INKI AZMAT NA KARO WO BID’ATI HAI, MUSALMANO KI RAAH KE KHILAF CHALTA HAI, AGAR TUJHE WAAZEH HAQ CHAHIYE TO MUSANNIF IBN ABI SHEBA, TAHAWI AUR MASNAD KHWARZAMI KA SAHEEYEEN SE MAWAZINA KAR, TO MASHRIQ AUR MAGHRIB KI DOORI PAYEGA”

(Hujjatullah albalagha 1/376, 387)

-ISI HAQEEQAT KA AITERAAF KARTE HUW SHAH WALIULLAH DELHWI MAZEED LIKHTE HAIN:

“LEKIN IMAM BUKHARI WA MUSLIM SIRF WAHI HADISE NAQAL KARTE HAIN, JISPAR INHONE APNE ASAATIZA SE BAHES WA MUNAZIRA KIYA HOTA HAI AUR JISKE BAYAN KARNE AUR TASHEE PAR INSAB KA IJMAA HOCHUKA HOTA HAI”

(Hujjatullah albalagha 1/387)

12)

 MOHAMMED ASHFAAQ AHMED HANAFI LIKHTE HAIN:

“Muhaddisin ka ijmaa hai k saheeyeen me jitni marfoo muttasil ahadees hain, wo qatai taur par saheeh hain”

(Sharah Tirmizi Tayyibus Sanadi: 1/2)

13)

 HAAFIZ IBN SALAAH RA. LIKHTE HAIN:

“sAHIH BUKHARI WA SAHIH MUSLIM ME MUTTASIL SANAD KE SAATH RASUL SAW KI JITNI AHADIS HAIN, WO BILA ISHKAAL SAARI KI SAARI YAQINAN SAHIH HAIN”

(Muqaddima Ibn Salaah: 12)

14)

ABDUL HAI LAKHNAWI HANAFI LIKHTE HAIN:

“bukhari wa muslim dono kitabein quran majeed ke baad sahih tareen kitabe hain, ispar mashriq wa maqhrib ke tamam muhaddisin ka ittefaq hai ke indono kitabo ki koi nazeer nahi” 

(Zafarul amaani: 58)

-mazeed farmate hain:

“Aisa shaksh jo rawat sahih muslim me shuba (doubt) kare k muslim wa aaqil the ya nahi? wo shaksh ya to mahez jaahil hai, fanoone hadis isma rijaal se mutlaqan waqfiyat nahi rakhta hai. ya muaand wa gumrah hai, aima hadees ne is amar par ittefaq kiya hai ke kitabullah ke baad sahih bukhari phir sahih muslim” 

(Majmuatal fatawa: 1/304)

15)

MOHAMMED AASHIQ ILAAHI HANAFI “SAWAANEH UMRI MOHAMMED ZAKARIYA HANAFI” ME LIKHTE HAIN:

“JAMHOOR KA MASLAK YE HAI K SAB SE MUQADDAM BUKHARI HAI, BALKE TAQREEBAN SAARE HI MUSALMANO KA ISPAR ITTEFAAQ HAI” 

(SAWAANEH UMRI MOHAMMED ZAKARIYA: 350)

16)

 QAAZI ABDUR RAHMAN HANAFI FAAZIL DARUL ULOOM DEOBAND LIKHTE HAIN:

“Sahih bukhari shareef kitabullah ke baad ashal kutub ke maghaz khitab se sarfaraaz hui, jisme fakhar maujoodat ramatillilaalam khatamal nabeeyyin saw. ki buland paya ahaadees ko amiril momineen filhadis abu abdullah mohammed bin ismaail bukhari ne murattab farmaya”

(fazul baari urdu sharah sahih bukhari: 1)

17)

Mohammed zakariya hanafi likhte hain:

“saari riwaayat bukhari sahih hain, agar kisi ne kalaam kiya hai to ghalat kiya hai” 

(taqreer bukhari shareef: 140)

18)

qAARI MOHAMMED TAYYAB HANAFI LIKHTE HAIN:

“iMAM bukhari ra ki jalalat shaan aur jalalate qadar se kaun musalman na waqib hai? 

ahle ilm me kaun hai jo nawaqif hai? inki tasneef ya taleef sahih bukhari ki azmat wa jalalat poori UMMAT PAR WAAZEH AHI, UMMAT NE IJMAAYI TAUR PAR TALQI BILQUBOOL HAI AUR “ASHAL KUTUB BAAD KITABULLAH” hone ki shahadat di hai, iske muallif bhi jalilulqadr, kitab bhi jalilul qadr aur kitab ka jo mauzoo hai wo HADEES HAI, YANI KALAAM NABI SAW WA AFAAL WA AQWAAL WA TAQREERAT. ISLIYE MAUZOO BHI MUBARAK, MUSANNIF BHI MUBARAK, TASNEEF BHI MUBARAK, HAQ TALA HUM SAB KO BHI MUBARAK BANAYDE KE INKE SILSILE SE HUM SAMNE AA RAHE HAIN”

(KHUTBAT HAKEEMUL ISLAAM: 5/456)

19)

RASHEED AHMED GANHUHI HANAFI

RASHID AHMED GANHUHI JINKE MUTALLIQ AASHIK ILAHI MEERTHI LIKHTE HAINKE BARHAA AAPKO APNI ZABAN FAIZ TARJUMAN SE YE KAHTE SUNA GAYA K 

“Sun lo haq wahi hai, jo rasheed ahmed ki zaban se nikalta hai, aur main baqasam kaheta hoon k kuch nahi hoon, magar is zamane me hidayat wa nijaat mauqquf hai meri itteba par” 

(Tazkiratur Rasheed: 2/17)

 -inhi k baare me ashraf ali thanwi hanafi likhte hian:

“Rasheed ahmed ganguhi farmate hain k 

“HAQ TALA NE MUJH SE WADA FARMAYA HAI K MERI ZUBAN SE GHALAT NAHI NIKALWAYEGA” 

(ARWAAHE SALASA: 310)

YAHI RASHEED AHMED GANGUHI LIKHTE HAIN: 

“BUKHARI ASHAL KUTUB HAI”

(TALEEFAAT RASHEEDIYA: 337)

AIMMA E HADITH AUR FITNA INKAAR E HADITH


 Bismillahirrahmanirraheem

AIMMA E HADITH AUR FITNA INKAAR E HADITH

Fitnah Inkaar e Hadees ,

Inkaar e Hadees ke Mamle mein yeh baath Dhayan mein rahni chahiye ke Musalmano mein se bohat kam log aise hai jo wakaai mein Sunnat e Rasoolullah saw , ki Sharai haisiyat Inkaar karte hain ,

al battah aise logon ki tadad bohat zayada hai jo Sunnat ke wazud ka Inkaar karne ke bawazud Sunnat se farar ki rah ikhteyar karne ke liye Hadeeson par agal-alag fitna karke Hadees ke Bhandhar ko shak o subah or bharosha na karne layak thairane ki zalil kosishon mein din raat lage rahte hai ,

Hadees ke Inkaari ka aithraz ka tahqeeq kiya jaye to Sharai Hukmon ko Qubol karne ya na karne ka Naqsha kuch is tarah shamne aata hai jaise Sharai Hukmon ka Jummah Bazar laga ho , or har Grahak ko is baat ki poori azadi hasil hai ke woh tamam chizon ko khub thok bazakar dekhe or jis-jis chiz ko apni Subhao or Pasand ke Mutabik paye use uthha lein or jis se NaPasand kare usse Naak chadakar wahi rakh dein ,

Yani Munkeeren e Hadees ke yeha Bartaao mein yahi haal Nazar aata hai
Koi Sahab Karamaat ke Inkaari hai to
 

Koi Sahab Panch ke bajaye Do Namazon ko hi kaafi samajhte hah
 

Koi Sahab Tish 30 ke bajaye ek ya do Roze rakhne se Farz poora hone ke Qaayal hai to Koi Sahab Hajj or Qurbani ke bajaye Samaj sewa ki kaamon par Paisa kharch karna Behtar Samajhte hai 

Koi Sahab Zakat ki door Hukumat ki marzi par Ghatane Badane ke kayal hai to Koi Sahab Rasool saw ki Ittat Farmabardari ko Aap saw ki paak zindagi tak hi mahdud samajhte hai ,

Fitna Inkaar e Hadees se paravhawit or Western Magribi Bichar or Sabyata o Tahzeb se Marub Taraqqi pasand Aqal mand Samajhdaron ne bhi apna sara zor e kalam or zor e bayan Hadeeson ki Shak o Subah or Bharosa layaq na samajhne par kharch kar diya hai take Eastern purwi samajh ko bhi wahi Nangi azadi hasil ho jaye jo Wertern Magribi samajh ko hasil hai ,

Aurton ko be pardagi Mard o Aurat ki mili juli mahfilen , zindagi ke har makaam mein Mard o Aurat ko saman Huqooq naama bazana or alag Aslilta or behayai failane wale kaam or riswat , sood , jua , sarab or zina jaise haram kaamon ko bhi kisi tarah Sariyat ki sanad hasil ho jaye ,

1-Hadees ke Imaamon ke Khidmaat par ek Nazar ,
Munkeren e Hadees ki Aithraz ka post martam karne se pahle Hifaajat e Hadees ke liye Ulama e Hadees ki Qurbaniyan , Kawiso par ek Nazar daalna bohat zaruri hai Ilm ke dunya mein hifaazat e hadees ek aisa azeem o shan karnaama hai jis se Ghair Muslim bhi manne par mazbur hai ,

a- Marhur Musat
Sharik Muhaqeen Professor Mar Girhte ka yeh manna ke ,
Ilm e Hadees par Musalmano ka Raskh karna jaeez hai ” be bunyad nahi ,

MustSharik Muhaqeen
Giiledh Jinhar
ne Ulama e Hadees ke khidmaat ka ateraf in sabdh mein kiya hai ” Muhaddisen ne dunya e Islam ke ek kinaron se doosre kinaron tak , Undulush se middle asia tak ke khak chuni or sahar – sahar , gaon – gaon ,
chappa – chappa , ka paidal safar kiya take Hadees Jama karen or apne shagirdon mein failayen , bohat zayada safar karne wale or bohat zayada ghumne wale Imaam e Hadees yahi log haqdaar hai ,

1-Abu Ayub Ansari raz , ne sirf ek Hadees ke tahqeeq ke liye Madina se Mishr ka safar kiya ,

2-Jabir bin Abdullah raz , ne ek Hadees sunne ke liye musalsal mahina bhar ka safar kiya ,

3-Makhul rh , ne Ilm e Hadees hasil kar ne ke liye , Mishr , Sham , Hizaz or Iraq ka safar kiya ,

4-Imaam Razi rh , farmate hai pahli baar Hadees ki chahat ka safar kiya to saal-saal tak ka safar kiya ,

5-Imaam Zahbi rh , ne Imaam Bukhari rh ke bare mein likha hai ke aapne sahar Bukhara ke ulama se Ilm e Hadees hasil karne ke baad
Imaam Bukhari rh ,
Balkh Baqdad , Makkah , Bashra , Kufa ,Sham , Ashkalan , Hamash or Damishk ke ulama se Ilm e Hadees hasil kiya ,

6-Yahya bin Saeed Al-Kitaan rh , ne talab e Hadees ke khatir apne ustad Shoba rh , ke paas 10 dus saal guzare ,

7-Naafe bin Abdullah rh , farmate hai maine Imaam Malik rh , ke paas 40 chalish ya 35 paitish saal tak baitha raha rozana subha , dopaher or pichli pahar haziri deta ,

8-Imaam Zohri rh , farmate hai maine Saeed bin Musay-yab rh , ki shagirdo mein 20 bis saal guzari ,

9-Abdullah bin Mubarak rh , ne 1100 Giyarha sho Muhaddisen se Ilm e Hadees hasil kiya ,

10-Hisham bin Abdullah rh , ne 1700 satrah sho Muhaddisen se Hadees ka Ilm hasil kiya ,

11-Abu Naeem Esbahni rh , ne 800 ulamayen Hadees ke 10 saal fayda hasil kiya ,
Ulama Hadees ne talab e Hadees ke khatir apni sari zindagiyan Imaan o Aarkan mein is shan se wakhf kar rahi thiy ke us daur mein ghar baar ki sari punji lutane ke baad bhi badi se badi aazmaish unke paon mein dagmagahat paida na kar saki ,

12-Imaam Malik rh , apne ustad
Rabiya rh , ke bare mein likhte hai ke Ilm e Hadees ki talash or zustazu mein unka haal yeh hoga tha ke ghar ki chhat ke kundiya tak bech daali , or is haal se bhi guzre ke khas o khasak ke dher se khazur ke thokde chun chun kar khane pade ,

13-Ilm e Hadees ke Imaam Yahya bin Moin rh , ke bare mein Khateeb rh, ne yeh riwayat darz ki hai ke Yahya bin Moin rh , ne Ilm e Hadees hasil karne mein 10,50,000 dirham ki rakam kharch kar daali or naubat yaha tak pahonchi ke unke paas paaon mein pahenne ke liye joota tak baki na raha ,

14-Ali bin Aasim rh , ne talab e Hadees mein 1,00,000 dirahm ,
Imaam Zahbi rh , 1, 50,000 dirahm , Imaad Rustan rh ne 3,00,000 dirham ,
Hisaam bin Abdullah rh , ne 7,00,000 dirham kharch kiya ,

15-Imaam Bukhari rh , jaise saheb e sarwat or laad pyar mein parwarish pane wale shaks ne talab e Hadees ke khatir garib ul watani mein
kaise-kaise din dekha iska andaza Imaam Mausufh rh ke hum sabak Umer bin Hafsh rh , ke bayan ki gayi is wakiye se lagaya ja sakta hai ,

Bashra mein hum Muhammad bin Ismail Bukhari rh , ke saath Hadees likha karte they kuch dino ke baad mahsus hua ke Bukhari rh , kai dino se Darsh mein nahi aa rahe hai ,
Talash hui hum log unke ghar pahonche to dekha ke ek anheri kothri mein pade hain , badan par aisa libash nahi jise pahen kar bahar nikal sake ,

Maloom karne par pata chala ke kharch khatam ho chuka hai libash taiyar karne ke liye bhi paisa nahi , aakhir mein hum sab shagirdon ne milkar rakam jama ki Bukhari rh , ke liye kaapda kharid kar laye tab woh hamare saath Darsh gaah mein aane jaane lage ,

16- Imaam Ahmad bin Hambal rh , Ilm e Hadees ke husul ke liye yaman aaye to ijaarband bunte or unhe bech bech kar apni zarurto ko puri karte rahe , jab farigh ho kar yaman se jane lage to naanbai ke makruz they , to apna joota karz mein de diya khud naange paaon paidal rawana ho gaye , rashte mein oonth par bojha laadne or uttarne wale majdor mein sarik ho gaye jo majduri milti usi se guzara karte ,

Talab e Hadees or Ishaaten Hadees ke liye Ulamayen Hadees ki shakt mehnat o musakkat or Qurbaniyon ki dashtan sirf unki din raat mehnat or bhook piyash ki zindagi par hi khatam nahi ho jati balke us raahe waafa mein zayada tar Muhaddisen kiram ko apne waqt ke jabir or jalim hukumaton ke qahar o gajab ka nisana bhi banna pada ,

17- Bani Ummayah ke waqt mein
Umer bin Abdul Aziz rh ,ko chhod kar
Muhammad bin Sirin rh ,
Hassan Bashri rh ,
Abdullah bin abi Rafeea rh ,
Yahya bin Ubaid rh , or
Ibne abi Qasim rh ,
jaise acche Muhaddisen ke umra ko atyachar ka nisana banna pada ,

18- Banu Abbash ke waqt mein ,
Imaam Malik bin Anas rh , ki naangi pith par kode barsaye gaye ,

19- Sufyan Suri rh , jaise unche choti ke Muhaddisen ko Qalt ka hukm diya gaya ,

20- Imaam Saafai rh , ko giraftar karke paidal darul khilafa rawana kiya gaya , jaha woh kaid o bandi ki takleefon ka bhi sikar rahe ,

21- Imaam Ahmad bin Hambal rh , ne Kitab o Sunnat ki khatir jo bhayandaak sitam uthaye woh tarik e Islam ka bada hi Ibrat nak wakiya hai ,

22- Imaam abu Hanifa rh , ka janaza jail ki tang o anheri kothri se utha ,
In jaani o mali Qurbaniyan ke saath-saath ulamaye Hadees ke Ilmi kaarname bhi saamne rakhne chahiye,

2- Hadees e Rasool saw ke Qubool karne ke maamle mein saabdhani Ahtiyat ka andaza is baat se laga ya ja sakta hai ke ,

1-Abu Bakr Siddiq raz ,
Umer Faruque raz , gawahi ke bina kisi ki Hadees Qbool nahi karte they,

2- Ushmaan Gani raz bin Affhan , saabdhani ke liye Hadees e Rasool saw kam bayan farmatey ,

3- Ali raz bin abi Talib , rawi e Hadees se Qasam liya karte they ,

4- Abdullah bin Masood raz , Hadees bayan farmate to jimmedari ke ahshas se unke chahre ka 
rang badadl jaata ,

5- Anas raz , saabdhani ke liye Hadees bayan karne ke baad ” Aao kaama Qala ” yani jaise Rasool saw ne farmaya ka sabdh aada farmate ,
Jab Sahaba e Kiram raz , ko Mamoli sa shak o subha lagta ke budhape ke wazha se inka Hafiza kamzoor ho gaya hai to woh Hadees bayan karna chhod dete ,

6- Zaid bin Arkaama raz , se unke budhape ke jamane mein Hadees suna ne ko kaha jata to farmate ” hum budhe ho chuke hai Hafiza kamzoor ho gaya hai , Hadees e Rasool saw bayan karna bohat baada kathin kaam hai ,

7- Imaam Malik bin Anas rh , farmate hai ke hum madina ke bohat se Muhaddisen ko jaante hai jo kuch aise sikka muttaki or parhezgar logo se bhi Hadees Qubool na karte jinhe apar baith ul maal ka muhafiz bana diya jata to ek paise ki baimani na karte ,

8- Mashoor Muhaddisen Yahya bin Saeedh rh , ka Qaul hai ke hum bohat se logo par dirham o dinnar ka aitbaar karne ko taiyar hun likin unki riwayat ki gayi Ahadees Qubool nahi kar sakte ,

9- Muhaddisen Moin bin Esha rh , farmate hai maine Imaam Malik rh , se jo Hadeesen riwayat ki hai un mein se ek ek Hadees 30-30 tish-tish baar suni hai ,

10- Muhaddisen Ibrahin bin Abdullah al Harwih rh , farmate hai maine Ustaad Hashim rh , se jo Haees riwayat karta hun unhen kam se kam tish-tish 30-30 , baar suna hai ,

11- Marhoor Muhaddisen Ibrahim bin Saeedh al Zohri rh , farmate hai mujhse jab tak ek-ek Hadees 100-100 tarike se nahi milti main us Hadees ko apne bare mein apne aap ko yattim khayal karta hun ,

3~ Aahadees ki Chaan bin o Tahqeeq ke mamle mein Ulamaye Hadees ne jo kaarnama anjam diyen hain woh is qadr hairan karne wali hai ke aaj ke daur ke yani Malti Media o science ki daur unki dhhul ko bhi nahi pahonch sakti ,

1- Mashoor Garman MustaSarik Muhaqeeq Doctor Siprahgar ne Ashab fee Ahwaal Sahaba ki angrazi Mukaddama mein likha hai ,
Koi Qaum dunya mein aisi guzri na aaj mauzud hai jisne Musalmano ki tarah “Aashma ur Rijjal ” jaise mahan Ilm ijad ki hai jiske badolat aaj
5,00,000 panch lakh aadmiyon ka haal maloom ho sakta hai ,

Muhaddisen ne Aashma ur Rijjal mein ek-ek raawi ki Aqeedhe , Imaan, Aamal, Parhezgari , Aamanat, Imaandari , Sachhai , Quaat e Hafiza , Sujh Bujh , ki Taqheeq ki kasaoti par parkha or kisi bhi badale ka tammanna ya malamat ki khuf se uper rahte hue apni Raaye ko waazhe kiya ,
Aahadees Ghaadne or Hadees mein Jhoot ki milawat karne wale logon ko na sirf alag-alag kar diya , balke kis Hadees mein Raawi ne apne taraf se kis Lafz ki zayadati ki to uski nisaandahi ki , kahi Sanad ki bahao mein fark aaya to na sirf use waazeh kiya balke Sanad ke Suru , Khatam ya Bich mein Sanad Bikhar ne ki bunyad par Hadees ki alag-alag darzah banaya ,

2- Bid’adti or Bad Aqeedah logon ki Hadees ko alag darzah diya ,

3- Wahmi or Kamzoor Hafizah walon logon ki Hadeeson ko alag darzah diya ,

4- Kahi Raawiyon ke Naam Sar Name upNaam , Kuniyat wala Naam , Baap Dada , ya Ustadon ki Naam ek jaise aa gaye to unke liye alag Usool banaye ,

5- Issi tarah Saheeh Hadees ke Mamle mein bhi darzah bandi ki gayi ,

6- Jaise Lafz par adharit Hadeeson ka ispastikaran kiya gaya ,

7- Raawiyon ki Taddad ki Hisab se Hadeeson ko alag-alag naam diya gaya ,

8- Saheeh Lekin Pahla darzah mein jaise Kalam kiye Gaye Hadeeson ke Baare mein Usool o 
Niyam banayen gaye ,

9- Hadees ke Riwayat karte waqt ,
Aakh baar’na ,
Aar’Baana ,
Naw’Lana ,
Zakar’Lana ,
 

jaise ek Lafz mein ek hi bhag ko Lafz alag-alag halaat o Kaifiyat ke liye khas kiye gaye ,
Ulamaye Hadees ke Ilmi Kosishon ka andaza is baat se lagaya ja sakta hai ke Hadees ke Hifazat ke liye Ulamaye Hadees ne 100-100 se bhi zayada Uloom ki bunyad daali jis par Hazaron Kitaben Likhi ja chuki hai ,

Ba Hawala ,
Sunnat Ka Anusaran ,
Muhammad Iqbal Kilani ,
Page no – 29 ,30 , 31 , 32 ,33 , 34 !!

Allah Ta’ala ki Beshumar rahmaten nazil hun un paak baaz hastiyon par jinhone halat ki sari shitam raniyon ke bawazud ,
 

Hadees e Rasool saw , ki shama ki khatir har jamane ki tez aandhiyon se mehfooz rakhne ka haq aada kiya ,

2- Hadees par Aaithraz ,

Hifaazat e Hadees ke liye Ulamaye Hadees ki jaani , maali or Ilmi Koshison par ek Nazar daalne ke baad hum asal mauzu topic , Inkaar e Hadees ke taraf laut tey hue Munkeren e Hadees ke aaithraz mein se kuch aham aaithraz yeha nakal kar rahe hai ,

a- Jo Hadees aqal ke khilaf ho woh yaqeen karna mumkeen nahi hai ,

b- Jo Hadees Quran ke Khilaf ho woh yaqeen karna mumkeen nahi hai ,

c- Jo Hadees Tarikhi ke waqiye ke khilaf ho woh yaqeen karna mumkeen nahi hai ,

d- Jo Hadees Scientific tazrubein or musahedaad ke khilaf ho woh yaqeen karna mumkeen nahi hai ,

e- Hadees Riwayat karne wale they to bayerhaal Insan hi har shaab dhani ke ba wazood khata ki mumkeen mauzud hai , yani Muhaddisen kiram ki Tahqeeq par poora yaqeen nahi kiya ja sakta ,

f-Jo Hadeeson mein Nange pan ka zikr ho woh yaqeen karna mumkeen nahi hai ,

g- Saheeh Hadeeson ke saath-saath badi taddad mein Dae’efh or Maudhu yani man gadhat 
Hadees is tarah gud mud ho gayi hain ke Muhaddisen ne apni sujh bujh ke mutabik jo Hadeesen Qubool ki woh bhi yaqeen karna mumkee nahi hai ,

h- Hadees ke Imaamon mein se zayada taddad mein Ahl e Farash ke hain jinhone Irani hukumat se milkar Islam ko Nushaan ke liye Sajish ki or an ginat Hadees ghadhi ,

i- Hadeeson ka Sakal jama Rasool e Kareem saw ki paak zindagi ke Do 200 ya Adhaai 250 saal bad hue , yani un par yakeen karna mumkeen nahi ,
Hadeeson par in tamam aaithraz ka waazeh tarike se post martam karna yaha mumkeen nahi yani hum yaha sab se zayada mashoor or aam logon ki zuban par aane wali aaithraz jo ke Hadees ke Sakal Jama ke bare mein hai uska poora jawab tahreer karne par bus karenge , Insha Allah

3 Hadees ka Sakal Jama ,

1- Kaha jata hai ke Hadeeson ka Sakal Jama Rasool saw , ke paaj zindagi ke 200 ya 250 saalon baad us waqt hua jab Imaam Bukhari rh , Imaam Muslim rh , Imaam abu Daood rh , Imaam Nasaai rh , or Imaam Ibne Maazah rh , wagairah ne Hadeesen jama karne ka kaam suru kiya yani Hadees ka Jama kisi tarah bhi yaqeen karna mumkeen nahi ,
Sab se pahle hum yeh galat fahmi dur karna zaruri samajh tein hai ke Rasool saw , ke zindagi mein Likhaai ya Kitab ka Riwaz aam nahi tha or log sirf apne Hafiza par bharosha karte they ,
Yaha hum un Sahaba raz , ka naam de rahe hain jo darbaar e Rishalat ke makami shagird they ,
Rasool saw unse zarurat padh ne par mukhtaleef kawail se talauk Letter ya Rakam ki hisabaat ya Sarkari Hukm ya Deeni Mashail aadi likh wane ka kaam liya karte the ,

2- Har Sahabi raz ka alag Duty jimmedari ka bayan Tareek Historic ke Kitab mein mauzud hai ,

a- Khalid bin Saeed bin al-Aash raz ,
 

b- Mugairah bin Shoba raz ,
 

c- Harish bin Nameer raz ,
 

d- Jahim bin Salath raz ,
 

e- Hujeyfa bin Yamaan raz ,
 

f- Muakeeb bin abi Fatimah raz ,
 

g- Abdullah bin Arkam raz ,
 

h- Aala bin Ukbaa raz ,
 

i- Jubaer bin Aawam ray ,
 

j- Usmaan Gani bin Affhan raz ,
 

k- Muwabiya bin abi Sufyaan raz ,
 

l- Ali bin abi Talib raz ,
 

m- Zaid bin Sabit Ansari raz ,
 

n- Hanjala bin Rabeea raz ,
 

o- Aala bin Hajrami raz ,
 

p- Ibaan bin Shaeed raz ,
 

q- Ubaai bin Kaab raz ,

3- Aahmad e Rishalat ke kuch doosre Sahaba raz , jo Bakaida Rasool saw , ki Khidmat par Tainaat nahi they Lekin Likhna Padhna jaante they woh yeh Hai ,

a- Kaab bin Malik raz ,
 

b- Umer Faruque bin Khattab raz ,
 

c- Fatemah binth e Khattab raz ,
 

d- Abdullah bin Umer raz ,
 

e- Khab’baab bin Asath raz ,
 

f- Saeed bin Zaid raz ,
 

g- Abdullah bin Abbas raz ,
 

h- Anas bin Malik raz ,
 

i- Abdullah bin Ubaai Aaufa raz ,
 

j- Saeed bin Ubaadah raz ,
 

k- Shamrah bin Zundub raz ,
 

l- Abdullah bin Amr bin Aash raz ,
 

m- Jabeer bin Abdullah raz ,
 

n- Abu Hurairah raz ,
 

o- Rafeea bin Khadij raz ,
 

p- Abu Rafeea Mishri raz ,
 

q- Hajab bin abi Baltah raz ,

Rasool ullah saw ke alag-alag Khidmaat ke alawa Sahaba raz , apni apni chahat o marzi ke mutabik Rasoolullah saw , ki Amali o Qauli bhi likhte rahte they , Kuch Sahaba raz , ko khud Nabi saw , ne Hadeesen likhne ki izazat di ,

a- Rafeea bin Khadij raz , farmate hai ke hum ne darbaar e Rishalat mein arz kiya Ya Rasool Allah saw , hum log Aap saw ki zaban mubarak se bohat se baaten sunte hain or unhe likh lete hain , Aap saw ka is baare mein kya irshad hai , Rasoolullah saw ne farmaya likh liya karo is mein koi harz nahi ,

b- Abu Rafeea Mishri raz , ne Nabi saw se Hadeesen likh ne ki izazaat mangi to Aap saw , ne izazaat de di ,

c- Anas raz , riwayat karte hai ke ek aadmi ne sikayat ki ke use Hadees yaad nahi rahti to Nabi 
saw ne farmaya ke apne haath se madad lo yani likh liya karo ,

d- Abdullah bin Amr bin Aash raz , farmate hain main Rasoolullah saw , ki zuban mubarak se jo kuch sunta likh liya karta , take use yaad kar liya karun , Quraish ne mujh se aise karne se mana kiya or kaha ke Muhammad saw , inshan hai kabhi gushe mein bhi baath karte dete hai, or maine likh na chhor diya fir Rasoolullah saw , ke khidmat mein iska zikr kiya to Aap saw , ne farmaya jo kuch mujh se suno zarur likh liya karo , us zaat ki qasam jiske haath mein meri jaan hai meri zuban se haqe ke siwa kuch nahi nikalta ,

e- Zaid bin Sabit raz , ko Rasoolullah saw , ne khas taaur par apni zarurat ke tahat bideshi zuban lafz likh ne or sikhne ka hukm diya tha ,

4- Yeha na likhne wali Hadees yani Quran ke alawa mujh se koi baath na likho ka wazahat karna zaruzi maloom hota hai ,

a- Quran Nuzul ke waqt Rasool saw , Qurani aayat ke alawa unki tafsilaat wazahat mein jo kuch irshad farmate Sahaba raz use ek hi jagah likh liya karte they ,

Ek mauke par Nabi saw , ne puchha yeh kya likh rahe ho ,? 

Sahaba raz ne kaha wahi jo kuch Aap saw , se sunte hain , tab Aap saw ne irshad farmaya kya Allah ke Kitab saath-saath ek or bhi kitab likhi ja rahi hai , Allah ki kitab alag karo or use khalish rakho ,

Rasoolullah saw , ke lafz se yeh baath wazeh ho rahi hai ke Sahaba raz , Qurani aayat or unki tafsilat wazahat yani Hadeesen dono ek jagah likh rahe they jisse Aap saw , ne alag-alag rakhne ka hukm diya na yeh ki Hadeesen likhne ki manahi farmayi ,

Jab Quran poori tarah hifazat kar liya gaya to manahi ka hukm aap se aap khatam ho gaya ,
Is Tafsirat ke baad hum Nabwi saw daur 11 hizri tak mein likhne or sakal jama e Hadees ki mishal pesh kar rahe hain , Yaad rahe ke Rasool saw ki Amali o Qauli ke alawa woh chiz jo Aap saw , ne Khuttut Letter , Hukm o Farman or sharkari Officer Adhikarion ke naam adesh o nasihat ki sakal mein taiyar karwaye woh sab Hadeesen kahlati hai ,

BaHawala ,
Sunnat ka Anusaran ,
Muhammad Iqbaal Kilani ,
Page no:- 34 , 35 , 36 , 37 ,

4- Nabwi saw Daur Mein Sahaba raz ka Daur 110 Hizri Tak Mein Kitabat o Sakal Jama e Hadees ,

1- Kitab us Sadqat ,
 

Abdullah bin Umer raz , farmate hai ke Rasoolullah saw , ne apni zindagi ke akhri dino mein sharkari officer adhikaron ke bhej ne ke liye Kibat us Sadqa Tahreer karwai jis mein janwaron ki zakat ke masail they ,
 

{ Tirmizhi }

2- Sahifa Amr bin Hazam raz ,
 

Rasoolullah saw , ne Yaman ki Gavarnor Arm bin Hazam raz , ko ek Saahifa likhwa kar bijhwaya jis mein Tilawat e Quran , Namaz , Zakat , Talaq , Azad karna , Qissah yani Maqtul ka Badla , Dooth yani Qatl hone wale ka khoon baha , or Faraiz o Sunnat , or Kabeera Gunah ki Tafsil darz thi ,
 

{ Musnad Ahmad , Abu Daood ,
Nasaai , Daru Kutni , Darmi , Hakim }

3- Sahifa Ali bin abi Talib raz ,
Rasoolullah saw ne Ali raz , ko ek Sahifa likhwa kar ata kiya tha jiske baare mein Ali raz , farmate they wallah hamare paas padhne likhne ki koi kitab nahi siwaye Allah ki kitab or is Sahife ke , mujhe yeh Sahifa Rasoolullah saw ne ata farmaya hai is mein Zakat ka masail likhe hain ,
 

{ Musnad Ahmad }

4- Sahifa Wail bin Huzr raz ,
Wail bin Huzr raz , apne watan hazre maut jane lage to Nabi saw , ne unke liye Namaz , Zakat , Nikah , Shood , Sarab wagairah ki masail par Sahifa taiyar karwa kar ata kiya ,
 

{ Tabrani }

5- Sahifa Shaad bid Ubada raz ,
Shaad bin Ubada raz , ne Rasool saw, se Hadeesen sun kar yeh Sahifa Murtab kiya tha ,
 

{ Tirmizi }

6- Sahifa Shamrah bin Zundub raz ,
Shamrah bin Zundub raz , ne yeh Sahifa Rasoolullah saw , ki paak Zindagi mein hi Murtaba farmaya jo baad mein unke Bete Salman raz , ke Hisse mein aaya ,
 

{ Hifazat e Hadees }

7- Sahifa Jabir bin Abdullah raz ,
Jabir bin Abdullah raz , ka Murtaba kiya hua yeh Sahifa Maansik Haiz ki Hadees par mustamil tha ,
 

{ Muslim }

8- Sahifa Anas bin Malik raz ,
Rasoolullah saw ke khas khadim Anas bin Malik raz , ne Rasoolullah saw , se khud Hadeesen suni or likhi fir Rasoolullah saw , ko suna kar unki Tasdeeq bhi karwai ,
 

{ Hakim }

9- Sahifa Abdullah bin Abbash raz ,
 

Abdullah bin Abbash raz , ke paas Hadeeson par mustamil kai kutub thi ,
{ Tirmizi }
Jab Abdullah raz , Maut ho gayi to unke paas se ek Camel oount ki bojh ke barabar kitaben thi ,
 

{ Ibne Shaad }

10- Sahifa Sadiqah ,
 

Abdullah bin Amr bin al-Aash raz , ke paas Hadeeson ka bohat bada zakhira bhandhar tha jiske baare mein woh khud farmaya karte the , Sadiqah woh kitab hai jis se maine Rasool saw se seedhe seedhe sunkar likha hai ,
 

{ Darmi }
 

Syed Abu Bakr Gazmawi rh , ki tahqeeq ke mutabik Sahifa Sadiqah mein 5374 se zayada Haseesen thi yaad rahe ke Bukhari o Muslim ki Gair Makroh Hadees ki tadad 4000 se zayada hadees nahi ,
 

{ Kitab at Hadees
Aahad e Nabwi saw mein }

11- Sahifa Umer bin Khattab ,
Is Sahifa mein Sadqat o Zakat ke Hukm Mauzud thi , Imaam Malik rh farmate hain maine Umer raz ki yeh kibab khud padhi thi ,
 

{ Moatta Imaam Malik }

12- Sahifa Usmaan raz ,
Is Sahifa mein Zakat ki Jumla
Maqsad Mauzud thi ,
{ Bukhari }

13- Sahifa Abdullah bin Masood raz ,
 

Abdullah bin Masood raz , ke Bete Abdur Rahman farmaya karte they ke yeh Sahifa unke walid ne apne haath se likha hai ,
 

{ Aaina e Parweziyat }

14- Musnad Abu Hurairah raz ,
 

Unke Nuskeh Sahaba ke Daur hi mein likhe gaye uski ek nakal Umer bin Abdul Azeez rh , ke walid Abdul Azeez bin Marwan rh ,
ke paas mauzud thi ,
Marwan Mishr Maut 86 hizri ,
 

{ Bukhari }

15- Khutba Fathe Makkah ,
 

Ek Yamani basinda abu Shah ki request binti par Rasoolullah saw , ne poora Khutba karane ka hukm diya ,
 

{ Bukhari }

16- Riwayat Aaisha Siddiqa raz ,
Aaisha Siddiqa RaziAllahu Anhuma , ke riwayat unke Shagird Urwah bin Zuber raz ne likhi ,
 

{ Dibacha Intekhab e Hadees }

17- Sahifa Saheeha ,
 

Yeh Sahifa Abu Hurairah raz , ne Murtab karke apni Shagird Hammam bin Mubrah rh , ke Ilma Karaya us mein 138 Hadeeesen hain jiska zayada tar taluk Aqlah se hai yeh Sahifa Hind o Paak mein Saye publicity ho chuka hai ,
 

Yaad rahe Abu Hurairah raz ki Umr 59 hizri mein hui hai jiska matlab hai ke yeh Anmol tareeki Kitab sahaba raz ke daur ki sab accha yaad gaar hai ,
Is Sahifa ka ek Nuskah jo chatti sadi mein likha gaya tha Muhaqeen Doctor Hamidullah sahab Prorish ne Damishk ke maktaba zahiriyah se maloom kiya,
 

Jabke is Sahifa ka doosra Nuksha 12wi sadi mein likha gaya tha Mausuf hi ne Barlin Library se maloom kiya dono kalmi Nuskhon ka mukabla karne par maloom hua ke dono Nuskhon ki tamam Hadeesen mein koi fark nahi ,
 

Sahifa Saheeha jisse Sahifa Humman bin Murwah bhi kaha jata hai , ke tamam Hadeeson ne sirf Musnad Ahmad mein likhai mauzud hai ,
Balke tamam Ahadees Kutub e Sitta mein Abu Hurairah raz , ke hawale se milti hai Mano Sahifa Saheeha is baat ka khula subot hai ke Hadeesen Ahad e Nabwi saw , or Ahad e Sahaba raz , mein likhi jati thi or Sahifa ki tamam Hadeeson ka Musnad Ahmad or Kutub e Sitta ki doosri Kitabon mein usi tarah ek hi jaise Lafz ke saath mauzud hona Hadeeson ki sehat ka bohat bada subot hai ,

18- Sahifa Baseer bin Nahiq rh ,
 

Abu Hurairah raz , ke ek doosre shagird Baseer bin Nahiq rh , ne Murtab kiya or Abu Hurairah raz , ko suna kar uski tasdik karai ,
 

{ Abdul Ibn e Bar,Jame Bayan ul Ilm }

19- Maktubaat e Naafe rh ,
 

Maktubaat e Abdullah bin Umer raz , ne Ilma karwaya or Naafe rh ne likha,
 

{ Darmi }

20- Kuttut o Wasaeef ,
 

Hadeeson ki Baqaida Kitabi Jakhiron ke alawa Aap saw ki thareer karwaye hue Kuttut o Wasaeef ki tadad Saikaddo mein hai jis mein kuch ek misal yeh hai ,

A- Dastori Muahedah ,
 

Hizrat ke baad Madina Munawara mein Islami Siyasat ki bunyad rakhte hi Aap saw , ne Muslim or Gair Muslim ko Adhikar Huquq o Kartabyh Jimmedari ke taluk se 53 dharao ka ek dashtori Muahidah taay kiya jis se tahreer karwaya gaya ,
 

{ Ibn e Hisham }

B- Sulah Hudahbya ke baad Rasooullah saw , ne Qaisar o Qishra Mukukash or Najashi ke alawa Bahren, Oman , Damishk , Yaman , Najd , Dimtul Jundub or Qabila Hamir ke Hakimon ko Daw’ati Kuttut bijhwaye ,
 

{ Rasoolullah saw ki Siyasi Zindagi }

C- Ek lashkar ko jang par rawana farmayte hue Rasoolullah saw , ne lashkar ke sardar ko ek Khat likhwa kar diya or farmaya falah jagah par pahonch ne se pahle is na padha jaye is Jagah par pahonch kar lashkar ke sadrdar ne khat khola or logon ko Rasoolullah saw ka hukm padh kar sunaya ,
 

{ Bukhari }

D- Dauran e Hizrat Suraka bin Malik ko parwana Aman likhwaya gaya ,
 

{ Ibne Hisham }

E- Apne Gulam Rafeea raz , or Alai raz ko azad karte waqt tahreeri parwana azadi ata farmaya ,
 

{ Mukaddama Sahifa Saheeha , Musnad Ahmad }

F- 2 Hizri mein Qabila bin Zamrah ,
 

5 Hizri mein Faraza or bani Gitfhan ,
 

6 Hizri mein Quraish e Makkah ,
 

9 Hizri mein Aqedar bani Abdul Malik se Tahreeri Muahidah taay kaiya gaya ,
 

{ Tabranhi , Ibne Shad ,
Ibne Hisham , al-Shaik }

G- Yahood e Khaybar ko ek Sahabi ko Qatl karne par Dooth ada karne ja tahreeri hukm jari farmaya ,
 

{ Bukhari o Muslim }

H- Gavarnor Yaman Muaz raz , ko ladke ki wafat par tahreeri taziyat naama irshal farmaya ,
 

{ Mustadrak Hakim }

I- Yamama raz , ko Ahle Makkah ke liye Gallah na rokhne ki tahreeri hidayat jari farmai ,
 

{ Fath ul Baari }

J- Bilal bin Harish Mazme raz , ko jabal Kadash ke Damaan mein Jagah dene ke liye tahreeri hukm naana jari farmaya ,
 

{ Abu Daood }

K- Alag-Alag Qabail ke naama Dooth ke marail likhwa kar bijhwaya ,
 

{ Muslim }

5 – Tabai ke Daur 181 Hizri Tak Mein Hadeesen Likhna o Sakal Jama ,

Tabai ke daur mein Hadees ke Imaamon ki ek aisi Jamaat taiyar ho gayi jis ne Ahad e Nabwi saw or Ahad e Sahaba raz mein likhi or jama ki gayi Hadeeson ke saath-saath doosri Hadeesen bhi samil karke Hadeeson ki bohat bada Bhandhar taiyar kar diya ,
Is Daur ke kuch tahreeri Kawisho ki kuch misal yeh hai ,

1- Urwah raz ne Gazwat Jang ke baare mein Hadeeson ka Bhandhar Martabah kiya ,
{ Tahzib ut Tahzeeb , Jild 7 }

2- Taaus rh ne Dooth ke baare mein Haseesen Jama ki ,
{ Bahqi }

3- Khalid bin Madhan al-Kalaai rh , ne Bohat sari alag-alag Haseesen Jama ki,
{ Tazkerat ul Huffaz , Jild 1 }

4- Wahab bin Munabba raz , ne Jaber bin Abdullah ki Riwayaton ka majbua taiyar kiya ,
{ Tahzib ut Tahzeeb }

5- Salman rh , Lashkari ne bhi Jabir bin Abdullah ki Hadeeson ka ek Bhandhar taiyar kiya ,
{ Tahzib ut Tahzeeb }

6- Abu Zaznaad rh ne apne ustad se halal o haram ke mutallik tamam Hadeesen taiyar ki ,
{ Abdul Ibne Bar ,
Jame Bayan ul Ilm , Jild 1 }

7- Imaam Malik bin Anas rh , ne Hasees Sharif ka Mustaanad Bhandhar Moatta Imaam Malik ke Naam se Murtab kiya jise Hadees ke Kitab mein Bunyadi makam hasil hai ,

8- Muhammad bin Muslim bin Shahab Johri rh , ne Shagirdana mein Sunnan o Aashaar Sahaba raz Darz ki ,
{ Abdul Ibne Bar ,
Jame Bayan ul Ilm , Jild 1 }

9- Umer bin Abdul Aziz rh , ne apne khilafat ke daur ” Safar 99 Hizri se Rajab 101 Hizri ” mein Hadees ki shakal Jama ke liye Hukumati satah par taiyari ki , Is maksad ke liye Islamic Desh ke tamam Mahir Muhaddisen ko Hadeeson ko Jama o Sakal ka Hukm zari kiya , Jis ke Natize mein Haseeson ki bohat se Bhandhar Rajdhani Capital Damiskh mein pahochaya gaye ,
Un Bhandhar ki Tahqeeq o Tarteb Mashur Tabaai or Mashur Muhaddis Muhammad bin Sahab Johri rh ,
Maut 124 Hizri ,
ne ki or unke nakal copy Islamic Desh ke kone-kone mein faila di gayi ,

Is jamane mein Hadees ke Jama par kaam karne wale Doosre Muhaddisen ke Naam yeh hai ,

A- Abdul Aziz bin Johri al-Basri rh , Makkah Mukarrama mein rahte they ,
maut 150 hizri mein hue hai ,

B- Muhammad bin Ishaq rh ,
Madina Mubbarak mein rahte they ,
maut 151 hizri mein hue hai ,

C- Saeed bin Rashid rh ,
Yaman mein rahte they ,
maut 153 hizri mein hue hai ,

D- Saeed bin Urwah rh ,
Bashra mein rahte they ,
maut 156 hizri mein hue hai ,

E- Abdur Rahman bin Amr Auzae rh ,
Sham mein rahte they ,
maut 157 mein hue hai ,

F- Muhammad bin Abdur Rahman rh ,
Madina Mubbarak mein rahte the ,
maut 158 hizri mein hue hai ,

G- Rabeea bin Sabib rh ,
Bashra mein rahte the ,
maut 160 hizri mein hue hai ,

H- Sufyan as-Suri rh ,
Khufa mein rahte they ,
maut 161 hizri mein hue hai ,

I- Jamaad bin abi Salma rh ,
Bashra mein rahte they ,
maut 167 hizri mein hue hai ,

J- Malik bin Anas rh ,
Madina Munawara mein rahte they ,
maut 179 hizri mein hue hai ,

K- Imaam Shabi rh , Imaam Johri rh ,
Imaam Makhul rh , or Kazi Abu Bakr Hajmi rh , ki Mahth Purn Kitaben Tabaai ke Daur hi ki yaadgar hai ,
 

{ Hifazat e Hadees }

L- Jameya Sufyan as-Suri rh ,
Jameya Ibnul Mubbarak rh ,
Jameya Imaam Auzaai rh ,
Jameya Ibne Zahir rh ,
Musnad Abu Hanifa rh ,
Kitab ul Khiraz Kazi Abu Yusuf rh ,
Kitab ul Aashar Imaam Muhammad Jauzi rh , jaise unchi choti ki Kitaben isi Daur mein likhi gayi ,
 

{Aaina e Parweziyat , Jild 4 }

6- Taabai Ke Daur Ke Baad ,
Taabai rh ke daur 181 hizri mein Hadees shakal Jama ki in koshish ke baad yeh kaam itna tezi se hua ke Tishri 3sri sadi mein sirf Musnad ke tarz par Murtab ki gayi Kitabon ki tadad 100 – 100 Se zayada hai , isi mubbarak daur mein Hadees Sharif ki sabse zayada pyare or Kitaben
Saheeh Bukhari ,
Saheeh Muslim ,
Sunnan Abu Dawood ,
Jamme Tirmizi ,
Sunnan Nasaai ,
Sunnan Ibne Maazah ,
Sunnan Darmi , murtab ki gayi ,

Uper likhe hue bayan ko dekhte hue Hum poore Yaken se yeh kah sakte hai ke ,
Pahla – Hadeesen Saheeha ka Galib taren hissa Rasoolullah saw ke paak zindagi mein likha ja chuka tha ,

Doosra – Chuke Ahad e Nabwi saw , or Ahad e Sahaba raz ka tamam tahreeri sharmaya Taabaen rh ki Murtab ki gayi Kitabon mein mauzud hai , Matlab Hadees likhne or Hadees Jama ki kosish mein Ahad e Nabwi saw se lekar aaj tak kahi bhi rukawat paida nahi hue ,

Tishra – Hadees e Saheeha ka jo Bhandhar aaj hamare paas mauzud hai woh Yakeenan thik-thik waisa hi ek mahfoz or mazbut zanzeer ki jodi kadiyan ke jariye Rasoolullah saw , ki zindagi se baad mein aane wali naslon mein Muntaqel hua Hai ,

Is Artical ko padhne wale Millat e Islamiya ke Bhaiyon o Baheno ,
Andaza lagayen ke Rasool e Kareem Sallallahu Aalayhe Wasallam , ke 200 ya 250 saal baad Hadees ke shakal Jama ka Fitna failana or man ghadat hai ,

Asal mein Hadees ke khilaf is saari shararat ka Asal maksad inhe aaithraz ke parde mein Muslim shamaj ko Kitab o Sunnat ki pawandagi se azad karna or Magrib West ki Nangi azad tahzeeb ko Musalmano par thopna hai ,

Jis mein Munkeeren e Hadees INSHA ALLAH Kabhi bhi kaamyab nahi ho sakenge ,
APNI MILLAT PAR QAYASH
AANKAWAMI MAGRIB SE NA KAR ,
KHAS HAI TARKEB MEIN QAUM
RASOOLULLAH HAI HASHMI ,¡¡¡

Allah se Du’a Hai ke Hum ko Ghar walon ko Aap logon ko or Sare Musalmano ko Quran o Sunnat ko Sahaba ke Manhaj par amal karne wala fir Daw’at Denewala banaye,
Ameen Ya Rabbil Aalameen ,

Posted By-Abdur Rahim Shah
aana.ahlehadees.7@facebook.com

AUR MAIN MARR GAYA……ZINDAGI SE 40we TAK KA SAFAR (PART -2)


Bismillahirrahmanirraheem

AUR MAIN MARR GAYA ………!

Aakhiri deedaar ke liye mere muh se chaadar hataayi gayi, badi be’dhangi si kataar me sabhi mera muh dekhkar aage badhne lage, koi apne kaano ko haath lagaata, koi muh ooper karke haath jodhta,

kisi ki aawaaz aayi, ya allah maaf karde, aur koi mere beton ko dhoond raha tha taake apni haaziri lagwa sake,

phir mujhe kandhon par uthaakar sabne meri qabr ki taraf (jo pahle taiyyar thi) chalna shuru kar diya,

phoolon ki dukaan se kuch ne ghulaab ke haar liye aur kuch pattiyan lifaafe me daal kar le aaye,

mujhe qabr me utaar kar mere uper mitti daali jaane lagi,

mere baaz khair’khwaah saath waali qabron ki mitti bhi mujhpar daal rahe they, is tarah mujhe mano mitti tale daba diya gaya, sab apne apne gharon ko chale gaye, har taraf khamoshi chha gayi, main jootiyon ki aawaazein sun raha tha,

main samjha ke jitni saza milni thi mil chuki. Ab qabr me Aaraam se pada rahoonga, magar ye baat mere waham wa ghumaan me bhi na thi ke ab ek mustaqal azaab se paala padne waala hai, aisa dardnaak azaab ke allah kisi dushman ko bhi na dikhaaye,

meri qabr ke baaher ghulaab ki khushbu aur agar’battion ki lapatein aur geeli mitti ki apni ek mahak thi, magar qabr me mera jee ghabra raha tha,

qabr ne ajeeb tareeqe se mere saath shikwah kiya

” aiy ghaafil insaan ! Tu duniya me magan tha, magar koi din aisa nahin ghuzra jis din maine tujhe awaaz na di ho ke main wahshat ka ghar hoon, main tanhaayi ka ghar hoon, main khaak ka ghar hoon, main keedon ka ghar hoon, jitne log meri past par chalte they, mere nazdeeq un sabse ziyaadah qaabil e nafrat tu tha, jabke aaj main tujh par haakim bana di gayi hoon aur tu meri taraf majboor kar diya gaya, tu dekhega ke main tere saath kaisa bura sulook karti hoon “

aanan faanan do siyaah farishtey meri qabr me aa dhamke, unhone Mujhe uta kar baitha diya ( na poocho us waqt meri haalat kya thi, us waqt main thar thar kaanp raha tha) intehaayi ghazab’naak lehze me bole..

Hairaani ki baat hai ke zindagi me shaayed kabhi maine koi Quraani aayat ya hadith e nabwi suni ho, lekin mujhe arabic sahih samjh me aa rahi thi ke ye pooch rahe hain ke

“tera rabb kaun hai ?”

ajeeb khabat sawaar hua mujh par ke main ne jawaab dene ki bajaaye ajeeb qism ki badh maarna shuru kar di, jaise shaitaan ne kisi ki chhoo kar baawla kar diya ho, mere mun se nikla

“haay haay main nahin jaanta”

phir mazeed shakhti se bole

” tera deen kya hai ?”

dobara maine wahi jawab diya

intehaayi ghazab’naak hokar bole

” kaun hain jinko teri taraf bheja gaya ?”

kismat khoti ke us waqt bhi meri zubaan se wahi alfaaz nikle

aasmaan se aawaaz aayi

” ye jhoota hai, iska bistara aag ka bicha do, ise aag ka libaas pahna do, iske liye dozakh ki taraf ek darwaaza Khol do “

ye awaaz aane ki der thi ke usi waqt meri qabr me lau aur garmi aana shuru ho gayi, aur qabr itni tang ho gayi ke meri pasliyan ek dusre me ghus gayin,

phir kya sunaaun ! Ek andha aur bahra farishta meri qabr par musallat kar diya gaya, jiske haath me lihe ka ek gurz tha, usne usse mujhe maarna shuru kar diya aur itna maara ke meri cheekhon ki awaaz jinno aur insaano ke elaawa ird gird ki baaqi tamam cheezein sun rahi thi….

Bhaiyyon aur bahno ! Agar tumhe pata chal jaaye ke mujhe us waqt kitni taqleef hui toh allah ki qasm ! Tum log apne murde dafnaana chhod do..

Bhaiyyon aur bahno ! Yahan maine bahut kuch bardaasht kiya aur ab bhi kar raha hoon, magar ek baat jo is saza se zyaada aziyat’naak dikhaayi de rahi hai, wah ye ke

aiy allah ! Qayamat ke roz ye zaleel wa makrooh chehra lekar kisi tarah tere huzoor haaziri doonga

apne jaraim ka tujhe kya jawab dunga ??

Qabr me toh koi dekhne Nahin aata ke yahan mere saath kya ho raha hai, magar maidaan e hashr me toh saari ummatein hon gi, saare ambiya e kiraam honge aur khususan sarwar e kaaynaat janab Nabi e akram sallalaho laihi wasallam bhi maujood honge, kya sochenge mere baare me ????

Kaash ! Koi bahen ya bhai mera ye paighaam meri aulaad ko bhi pahuncha de ke

” aao apne bad’naseeb baap ki angaaron se bhari hui qabr dekho,

mere bacchon ! Meri qabr me mujhe bahut se saanpon ne gher rakha hai jo saara din mere jism ko nochte rahte hain,

mere beton ! Meri qabr par ek baar toh aakar dekho, agar tumhe yahan aane ki fursat nahin toh mere chhode hue maal mese kuch sadqah kar do,

ye bhi toh ek misqeen ki ek ilteja hai ke mere zimma abdurrahman ki raqam hai, jiska tumhe ilm hai, kamse kam uska kuch kardo,

barkhuddaar ! Abhi tak tumne usse raabta nahin kiya, tumhe yaad hoga ke tumne janaaze me elaan bhi kiya tha, abdurrahman ne us waqt  Munaasib na samjha ke raqam ke baare me tumse baat kare,

uski sharaafat dekho ke raqam ke mutaalbe ke liye aaj tak tumhaare darwaaze par nahin aaya,

allah ke waaste ! Kam se kam wahi hisaab chuka do,”

main yahan bahut be’bas hoon, cheque book safe me padi rah gayi, aur aate waqt tumne meri RADO ki ghadi, sone ki angoothi, locket, purse, sab kuch nikaal liya, hatta ke mere kapde tak utaar liye, ab yahan kya hai mere paas ???

Kal jab wah mujhse maangega toh main kahan se doonga ??

Nekiyan toh pahle hi mere paas nahin ke use de kar raazi kar loon, ab lagta hai uske gunaah mujh par laad diye jaayenge….

Beta ! Kitne dukh ki baat hai ke karza ada karne ki tumhe taufeeq na hui , magar mere CHAALISWEN (40wa) par tumne kai lakh  kharch kar daale,

kya zaroorat thi itne bade bade logon ko ikatta karne ki ??

Kya zaroorat thi akhbaar me khabar aur tasweeraat lagwaane ki ???

Kya zaroorat thi dawati Cards chhapwaane ki,

Roasted murga, paaye, biryaani, meethe chaawal, feereeni wagerah ki lino me saja kar vedio banwaate hue tumhe zara sharm na aayi aur phir doob marne ka maqaam tha jab do Bhaaand shaamiyaane aur itna bada majma dekhkar makhsoos awaaz nikaalte hue pindaal me aaye,

wah toh ek sahab ne aqalmandi ki ke jaldi se aage badh kar unhe bataya ke -” shadi ki taqreeb nahin, balke haaji sahab ka chaaaliswan hai”

Magar wah bhi aakhir bhaand they, jaate dafa kahne lage

” mashaallah ! Haaji sahab ke chaaaliswen ka ye haal hai toh shaadi par kya toofaan barpa hua hoga”

Mere bachhon ! Jab tum ghar me ( jise main itna samjhta tha) zor zor se kahkahe lagaate ho toh allah ki qasam ! Mujhe yahan bahut taqleef hoti hai itne be’huda aur fahash gaano ki awaazein is ghar se buland hoti hai ki allah ki panaah,

Agar gaane bajaane ke be’ghair tumhari ghuzar nahin hoti toh kam se kam awaaz hi aahista rakha Karo,

mere marne ke baad nayi Car, nayi motor cycle, kya sochte honge muhalle waale ??

Tumhaare saamne toh kuch nahin kahte , magar saara muhalla kahta hai ke

“Baap ne marne par jashn mana rahe hain”

mere bachon ! Main jaanta hoon ke tumhaara waqt bahut keemti hai,

bas aakhiri baat ! Iske baad kuch nahin kahunga,

beta ! Apni maa aur apni bahno se kahna ke allah se daren, chand din bhi unse sabr na ho saka , khoob banaao singaar karke itne chamkeele, bhadkeele libaas aur khule baalon ke saath be’pardah baaher aana jaana chhod den,

kyon karte ho ye sab kuch ???

Kyon aziyat dete ho mujhe ???

Yaqeen maano ! Ye sab kuch karte tum ho aur bhugatna mujhe padta hai, meri saza me izaafa hota hai,

kyon karte ho is tarah ??

Aakhir main tumhaara baap hoon, jo sulook tum mere saath kar rahe ho is tarah toh koi shareef hamsaaya bhi nahin karta, tum meri aulaad ho,

baap samjhkar nahin toh kam se kam ek Hamsaaye jitni ahmiyat toh de do,

zindagi me tum abba jaan, abba jaan kahte thakte nahin they, tumhe hi paalne ke liye Haraam kamaata raha,

aaj kya ho gaya hai mujhe ??

Yahi na ke yahan mere paas daulat nahin hai,

tumhaara satya nash ! Drawing room me meri itni badi tasweer par haar daal kar saja rakhi hai, kisko dikhaane ke liye ??

Jaao ! Main tumhe apni jaaydaad se aaq karta hoon,

Allah tum jaisi aulaad kisi ko na de….

Khair ! Is me mera apna kusoor bhi hai, maine aulaad ke liye sab kuch kiya, magar unki tarbiyat ke liye kuch bhi na kiya,

main kahta tha ke bacche bade hokar kya kahenge ke hamare baap ne hamare liye koi jaaydaad bhi nahin banaayi,

Afsos ! Agar unki tarbiyat allah aur uske rasool nabi e akram sallalaho alaihi wasallam ke tareeqe par karta toh aaj yahi aulaad mere liye Sadaqah jaariya hoti

us waqt agar koi kahta ke

” apni aulaad ko quraan ki taaleem bhi dilwaao”

toh main Kahta -” maine use afsar banaana hai koi mulla nahin banana “

afsos ! Acche afsar toh ban gaye magar acche musalman na ban sake,

ya kam se kam ek beti ki acchi tarbiyat kar deta toh shaayed mere liye jannat me daakhile ka zariya ban jaati,

magar ab pachtaane se kya faayeda, ye toh zaahir hai ke, jaisa karoge waisa bharoge

mujh jaise na’farmaan maa baap ka yahi haal hona chahiye

bhaiyyon aur bahno ! Bas aakhiri baat ! Mere lazarte hue haath dekho,

ab allah ka waasta dekar kahta hoon mere is anjaam se ibrat pakdo,

budhaapa aane se pahle is jawaani me kuch kar lo, bimaari aane se pahle is tandrusti me kuch kar lo,

tangi aane se pahle is khush’haali me kuch kar lo

masroofiyat me aane se pahle fursat me kuch kar lo, aur maut aane se pahle zindagi me kuch kar lo !

Warna meri tarah pachtaaoge, bahut pachtaaoge……..

Mujhe ab ummeed ki ek hi kiran nazar aati hai ke meri baatein sunkar kisi bahen Ya bhai ne alalh ke khauff se sirf ek aansu baha diya aur sacchi tauba karli toh na jaane kyon mera dil gawaahi deta hai ke ek aise fardh ki badolat allah meri Qabr thandi kar deda, mera azaab tal jaayega,

meri Qabr ki tangi kushaada kar di jaayegi, mujhe jannati khushboo aayengi, meri qabr me jannati bistar bichh jaayega, mujhe jannati libaas pahna diya jaayega

aur kaha jaayega

“soja ! Jis tarah dulhan so jaati hai”

Bhaiyyon aur bahno ! Ab taras khaao, is bad’naseeb bhai par,

allah ke waaste ! Susti na karna .

Abhi se yahan aane ki taiyyari shuru kar do,

meri taraf dekho ! Mujhe mare hue kai saal ghuzar gaye, magar jaan nikalte waqt jo taqleef hui, aaj bhi mahsoos kar raha hoon,

ab toh dil se ek hi dua nikalti hai ke

parwadigaar ! Mujh jaise anjaam se har musalman mard aur aurat ko mahfooz farma

unki qabr aur hashr ki manzilein asaaan farma………..AMEEN

AUR MAIN MARR GAYA……ZINDAGI SE 40we TAK KA SAFAR (PART -1)


Bismillahirrahmanirraheem

AUR MAIN MARR GAYA……!

Maqam e ibrat hai un logon ke liye jo allah aur uske rasool nabi e akram sallalaho alaihi wasallam ke ahlaamaat ko   na sirf past pasht daalte hain balke ulta mazaaq udhaate hain aur aakhirat ki zindagi unhe qata’an yaad nahin, agar isi haalat me unhe maut  ne ghera toh allah na kare ke kisi ka anjaam is shakhs jaisa ho……

Mera bachpan naadaanion me ghuzar gaya, jabse hosh sambhaala, apne badon ki tarah duniya ki taraf bhaagta raha, mujhe gharz daulat se thi, chaahe halaal tareeqe se aaye ya haraam, soodi len den, cricket matches me shartein, Prize bond, lottery aur rishwat ki kamaayi ne dono me mujhe crorepati bana diya,

itni daulat ikatthi ki ke mujhe andaaza nahin, har qism ka naya fashion mere ghar me aata, hi fi T.v, dher saari filmen, dish, gharz aisi koi nahoosht na thi jo mere ghar me maujood na ho,

raat ko family ke saath kamse kam Ek film dekh kar sona har roz ka mamool tha,

jab koi mahmaan ghar aata main bade fakhr se chhoti beti ko awaaz deta,

“Beti ! Zara uncle ko aur Aunty ko dance toh karke dikhaao “

dusre bacche bhi dramo aur filmon ki mukhtalif kirdaaron ki naqalen utaarne me bade maahir they,

mukhtalif film ke Dialogue unko khoob yaad they, jhoom jhoom kar gaane sunaate aur acchi kaarkirdgi par inaam paate….

Ghar me gate par numaaya likha tha

” haaza min fazli rabbi”

aksar mere zehan me aata ke Shaitaan mere baare me kya sochta hoga ke daulat ikatthi karne ke saare gur maine sikhaaye , phir usi kamaayi se itna aaalishaan ghar bana aur ab itne be’wafa nikle ke us par likhwa diya

” haaza min fazli rabbi”

intezaamiya se theek thaak maraasim ki wajah se koi mujhe poochne waala na tha, mera shumaar shaher ke chand ek raeeson me hota,

itni daulat hone ke ba’wajood saari umar mujhe hajj ki sa’aadat naseeb na ho Saki, lekin aksar log mujhe Sahab kah kar pukaarte, mere yahan aksar majma laga rahta, oonchi aawaaz me ek dusre ko gaaliyan dena toh aam maamool tha, aur is shor sharaabe se poora mohalla tang tha, khususan agar pados me koi bimaar hota, magar kisi ko mere khilaaf baat karne ki jurraat na thi,

Mohalle ki masjid me mera aana jaana bas Eid ke roz hi tha,

duniyaawi baatein karne me main thakta nahin tha, meri zabaan kainchi ki tarah chalti,

magar bad’qismati se meri zabaan allah aur uske rasool nabi e akram sallalaho alaihi wasallam ke zikr karne ke maamle me bilkul goongi thi,

kabhi kisi daadhi waale se saamna hota toh na jaane kyon tabiyat machalne lagti, khoob bahas mubaahasa hota aur aksar baatonme mere dalail kuch is qism ke hote

NAMAZ

“soofi sahab ye toh faarigh logon ka kaam hai, abhi toh badi umar padi hai,a bhi taange saath de rahi hain, jab taangen kaam karna band ho jaayengi phir Masjid aur tasbeeh hi rah jaayegi,”

ROZA

” roze toh rakhen ghareeb, jinke paas khaane ko kuch nahin, ham toh khaate peete log hain”

ZAKAAT

“ye toh tax ki ek Qism hai, aur wah ham huqumat ko de rahen hain”

DAADHI

” Hazrat ji ! Ye koi umar hai daadhi rakhne ki ? Kyon shaadi ki market me mera rate dawn kar rahe ho, mujhe abhi chacha ji ,baba ji nahin kahlawana”

PARDAH

” pardah toh dil ka hota hai, tum logon ki niyyat me futoor hota hai”

SADQAH

” allah chaahta toh ghareebon ko khud khila deta, jinhe allah na de unhen ham kyon den ??”

AAKHIRAT

“Chhodo ji ! Ye sab maulwion ki ghadi hui baatein hain, khwaah ma khwaah daraate rahte ho, wah jahan kisne dekha hai,

haan ! Agar aisa koi chakkar hua toh chunke mujhe yahan bahut kuch mila hua hai, aage jaakar bhi mere paas bahut kuch hoga, phir kya mujhe koi akele marna hai, jahan sabhi honge, wahan main bhi chala jaunga, 4 din ki zindagi Hai, khoob ayyashi ke saath guzaaro “

Waqt ghuzarta gaya, La’parwaahi din ba din badhti gayi,

ek din achaanak mere wajood ne kaam karna chhod diya,

ek baar aisi haalat ho gayi ke sirf ek ghilaas paani maangne ke liye mujhe poore jism ki quwwat sarf karna padi,

agle hi lamhe doctaron ki poori team mere gird maujood thi, mere kaano me awaaz padi ke dil ka shadeed daura hai, Bas dua kijiye !

Ye sunte hi mujh par kya ghuzri, ye main hi jaanta hoon,

mere allah us waqt mujhe pata chala ke main kitni Baqwaas kiya karta tha ke Mauseeqi (music) rooh ki ghiza hai aur gaane bajaane se dil ko sukoon milta hai,

aaj toh mujhe us sukoon ki bahut zaroorat thi, aaj mera dil gaane sunne ko kyon nahin chaah raha ????

Mujhe shaher ke ek bade hospital ke ek air conditioned kamre me laakar lita diya gaya, main bed par pada chhat (roof) ko dekh raha tha,

hairaani ki baat hai ke us waqt chhat ek bahut badi Screen thi,Aur uspar meri ghinauni zindagi ki poori film chal rahi thi, chhote bade gunaah sab saaf nazar aa rahe they

Aah ! Kaisi ajeeb film thi ???

Main gunaah karna toh darwaaze band kar leta ke koi dekh na le,

Afsos ! Ye na socha ke ek zaat aisi bhi hai  jo meri ek ek harqat dekh rahi hai, meri bad’bakhti ke farsh waalon se mujhe itni sharm aati rahi aur Arsh waale se mujhe kabhi sharm na aayi

Aah ! Kitna be’sharm tha main,

Us waqt mujhe ehsaas hua ke,

” aiy bad’bakht insaan ! Allah taala ki hasti kis qadr saabir hai ke teri musalsal bad’aamaalion aur siyaah kaariyon apr us zaat ne kitna sabr kiya aur tu aisa zaalim tha ke itni mohlat diye jaane ke ba’wajood apni jaan par zulm karta raha “

Apni isi bhayaanak film me uljha hua tha ke mujhe mahsoos hua ke jaise mere gird ‘ LA ILAAHA ILLALLAH ‘  ka wird ho raha hai, phir achaanak qalime ke wird me tezi aa gayi,

hairat hai ! Jab main gaane sunta toh Be’akhtiyaar meri zabaan harqat karti, saath saath main bhi gungunaata tha, magar aaj ek hi jumle ka wird ho raha tha, magar badi koshish ke ba’wajood meri zabaan se ek lafz jaari na hosaka…..

Mujhe mahsoos hua ki jaise mujhe ubalti hui deig me daal diya gaya ho, jaise talwaar se mere tukde karna shuru kar diye gaye hon, jaise zinda bakri ki khaal utaari ja rahi ho,, jaise belne me ganne ke saath mujhe bhi daal diya gaya ho, jaise mere jism ke chappe chappe par drill machine daal diya gaya ho, jaise rail ki patri par mera sar rakh kar uper train ghuzaar di ho, jaise zinda chidiya ko aag par bhoona ja raha ho, jaise ek kaante daar tahni ko mere andar daakhil karke ek dum baahir kheench liya gaya ho,

Allah ki qasam ! Agar maut ki is talkhi ka jaanwaron ko pata chal jaata toh duniya waalon ! Koi tandrust jaanwar tumhe khaane ko na milta…

Main bahut chillaaya, bahut waawela kiya, allah ko waasta de Kar mutmain karta raha ke aaj chhod do, main bahut nek ho jaunga, aindah gunaah ke qareeb bhi na phatkunga, nahin chhodunga aajse namaz, nahin sunoonga aaj se gaane, nahin dekhunga filmen

Haaye mere allah ! Haaye maa ! Kash toone mujhe jana hi na hota, kya ho gaya hai mujhe, aaj toh mera maal bhi mere kaam na aa raha hai, kahan marr gaye kaarinde, kahan marr gaye taallukaat, kahan gaya mobile par music ka baar baar bajna ???

Achaanak malikul maut ki dahshatnaak awaaz mere kaanon tak pahunchi, jisne rahi sahih kasar bhi nikaal di

” Nikal aiy khabees rooh ! Apne khabees badan se nikal ! Aaj tu bahut qaabil e muzammat hai, kholte hue paani, peep, zaqoom aur tarah tarah ke azaabon ki tujhe khush’khabri ho”

uff mere allah !kya har badkaar ki rooh aise hi nikalti hai ??

Us waqt main itni taqleef mahsoos kar raha tha ke jaise kisi ne baareek sa kapda kaante’daar tahniyon par daal kar zor se apni taraf Kheencha ho, is tarah mera saara badan taar taar ho gaya, pahle paaon thande hue, phir pindalian aur aahista aahista poora badan thanda ho gaya…….

AUR MAIN MARR GAYA !

Malik ul maut ne meri rooh kheench kar nikaali (jaise garam salaakh, geeli Oven me rakh kar kheench i gayi ho), usi waqt aasmaan se kaale chehre waale farishtey utre, unhone palak jhapakne me meri rooh ko pakda aur ek gande se taat me lapet diya jo unke paas pahle se maujood tha,

ek waqt tha ke main ghar se bahtareen suit aur aala Qism ki khushboo lagakar nikalta aur jis gali se ghuzarta, pata chalta ke falan sahab ghuzar rahen hain,

magar aaj mujhse is qadr badboo aa rahi thi jaise kai jaanwaron ki laashen kisi jagah ikatthi padi hon,

farishtey meri rooh ko lekar aasmaan ki taraf chadhna shuru ho gaye, wah farishton ki jis jamaat ke paas se ghuzarte

wah poochte ye khabees rooh kis ki hai ???

Wah kahte-” falan bin falan ki “

Bahut bure tareeqe se mera naam bata rahe they, jis taraf se ghuzar hua anginat farishton ki awaazein mere kaanon me goonj rahin thi, laanat ho , laanat ho, laanat ho,

aasmaan e duniya par pahunch kar farishton ne darwaazah kholne ke liye kaha, magar darwaaza na khola gaya

awaaz aayi -” is qism ke logon ke liye aasmaan ke darwaaze nahin khole jaate aur na hi is qism ke log jannat me daakhil honge, inka jannat me jaana itna hi muhaal hai jitna sui ke naake me oont ka daakhil hona”

Phir meri rooh neeche phenk di gayi…

Idhar jama masjid ke bade bade speakaron se mere janaaze ka elaan ho raha tha,

wah masjid jiske baare me pahle bata chuka hoon ke saari umar mujhe kam hi daakhila naseeb hua,

magar na jaane kyon aaj ajeeb qism ke taareefi kalimaat ke saath mere janaaze ka baar baar elaan ho raha tha aur har martaba mujhe haaji sahab kah kar pukaara gaya,

zindagi me jab kisi ke marne ka elaan hota Toh main hanste hue kahata

” lo ji ! Aaj ek aur sahab out ho gaye”

lekin ye baat mere waham wa ghumaan me bhi na thi ke usi speaker par bhi mere janaaze ka elaan hoga….

Meri aankhen band kar di gayin, aur jabdon par kapda baandh diya gaya,

meri bad’qismati ke rote rote kuch ne maatam karna shuru kar diya aur kuch ne baal nochne shuru kar diye magar baad me azaab mujhe bhugatna pada,

isi dauraan asar ki azaan ho gayi, ghar me auton ka hujoom aur baaher mardon ka,

lekin afsos ! Shayed hi kisi ne namaz padhi ho, maine cheekh kar kaha

“aiy ghaafilon ! Mujhe chhodo main toh apne anjam ko pahunch chuka, tum apni fikr karo, namaz ka waqt ja raha hai, lekin itni shor sharaabe me meri kaun sunta ???”

meri laash ke gird ghar’waalon aur rishte’daron ka ek hujoom tha,

mera ek haath chhoti beti ne aur dusra haath badi ne apne apne gaalon par laga rakha tha, paaon ko beton ne apne baazuon me jakda hua tha , meri biwi baar baar mere chehre ki taraf dekh rahi thi, meri maa mere chehre par haath fer rahi thi, aakhiri martaba meri maa ne mere maathe ko chooma aur phir ek dum ghama ghahmi si ho gayi, koi kafan khareedne ke liye kah raha tha, toh koi qabr khodne ke liye, koi light ka bando’bast karne aur koi ghusl dene waale ko bulaane ke liye…

Ghusl dene ke liye masjid se molvi sahab ko laaya gaya, unhone mujhe ek takhte par litaakar aahista aahista mere pet ko dabaana shuru kiya taake koi gandagi wagerah ho toh nikal jaaye

phir unhone apne haath par kapde ka lifaafa baandh kar ghusl ki niyyat ki aur meri sharm’gaah dhoyi , nijaasat saaf ki, phir haath se lifaafa utaar kar mujhe wuzu karaaya aur mere jism par paani daala, ooper se shuru kiya aur neeche ko le gaye, teen baar aisa kiya

aur ye wahi molwi sahab they jinka main zindagi me aksar mazaaq udaaya karta tha, aur kabhi apne qareeb nahin phatakne Diya, magar aaj wahi mere kaam aa rahe they,

mere ghar waalon ne kafan ke taur par reshmi kadhaayi waala libaas mujhe pahna diya aur phir mujh bad’naseeb par intehaayi keemti parfume ka bharpoor chhid’kaao kiya gaya ke un Aqal ke andhon ko kiya pata ke abhi mere saath kya beeti hai ???

Agar main bataane ke qaabil hota ke farishton ne mere saath kiya sulook kiya, toh allah ki kasam ! Sab meri mayyit ko chhodkar bhaag jaate aur apni apni fikr me lag jaate,

isi dauraan mera chhota beta bhaag kar ek photographer ko le aaya jo badi furti se mere ird gird ki tasweeren kheench raha tha,

phir vedio waale aa gaye, unhe dekh kar main samjh gaya ke mujhe reshmi libaas kyon pahnaaya gaya, log apni apni film banwaane ke liye andaz badal badal kar meri chaar’paayi ke gird ghoom rahe they….

Program ke mutaabik mere janaaze ka waqt ho gaya, awaazein aana shuru ho gayin

” deir ho rahi hai ji”

janaaza uthaane  Ki der thi ki aurton ki cheekhon ki awaaz se saara muhalla hilkar rah gaya, mere biwi bacche chaar’paayi se lipat gaye, badi mushkil se mujhe baaher nikaala gaya,

4 aadmiyon me meri chaar’paayo ko kandho par utha liya, sadak par pahunche toh saare dukaandaar khade hokar afsos ka izhaar karne lage, kuch log aage traffic control kar rahe they,

logon ki kadamon ki chaap se maine andaaza lagaaya ke laakhon ka majma hai,

afsos ! Kisi muttaqi, parhezgaar, tahajjud guzaar, ghareeb aadmi ka janaaza hota toh 50 aadmi ikkatthe na hote,

janaza gaah me ajeeb manzar tha, kuch log mere wahan pahunchne se pahle hi maujood they, jo siyaasi aur kaaro baari guppen laga rahe they

awaaz aayi

” sab aa gaye hain ji”

safen durust ki gayin,

itne me mere bade bete ne rasm poori karne ke liye aahista se awaaz nikaali, jo shayed pahli saf waale bhi  theek se na sun saken hon,

“bhaiyyon ! Agar kisi ka qarz mere baap ke  Zimme ho toh wah baad me mujhse raabta kar sakta hai,”

agar imam sahab ko mere qarz ke mutaallik ilm hota toh mujhe yaqeen hai ke wah meri namaz e janaza padhaane se inkaar kar dete

imam sahab ne allahu’akbar kaha hi tha ke ek shakhs ki zordaar awaaz aayi

“thahro ji !kuch log aur aa gaye hain”

baher’haal imam sahab ne haath baandh liye,

afsos ! Itne bade majme me chand ek honge jinhe namaz e janaza aati ho, warna is maamle me sabhi mere bhai nazar aa rahe they aur maare sharm ke daayen baayen nazarein ghuma rahe they, kuch saamne lage bade se board ko ghoor rahe they jaise kuch padhne ki koshish kar rahe hon,

4 takbeer kah kar salaam pher liya gaya, aur mere in bhaiyyon ki jaan me jaan aayi,

chunke har mayyit ke saath main bhi aisa hi karta tha, aaj mere saath bhi wahi sulook hua,

mere janaaze me bahut si aisi hastiyan maujood thi ke agar mere saath unki bhi namaz e janaza padha di jaati toh Bahtar tha…..

to be continued……..